औंटा क्यों है बेबस?

बिहार।पटना।मोकामा।औंटा क्यों है बेबस?

मोकामा, सुन कर आप सब के जहन में क्या आता है? बाहुबली,हथियार , हत्या या वो विधायक का विधानसभा क्षेत्र जो कहता है बिहार में अंडविशेष की सरकार है । मोकामा के सन्दर्भ में ये सारी तथ्य सौ प्रतिशत सत्य है..

दूसरा सत्य ये है कि कभी सत्ता का द्वार कहे जाने वाला मोकामा आज एक बुनियादी अस्पताल के लिए तड़प रहा है, यहाँ लोग बिल्कुल वैसे मर रहें है जैसे धूप में आते ही खाट से निकल कर खटमल या फिर एक झापड़ मच्छर ,झापड़ बेहद टाइट वो भी सिस्टम का..कोरोना त्रासदी में लोग मूलभूत मेडिकल सुविधाओ से वंचित हो रहें है तो मोकामा के हिस्से में ये हालत दशकों से है…

आगे आते हैं,मोकामा प्रखंड का एक अतिचर्चित गाँव है,आदर्श ग्राम औंटा,आज कल औंटा जिन वजहों से चर्चित है वो मानवीय नही है, यहाँ की गलियों गजब की मायूसी फैली हुई है,पिछले पाँच दिनों में औंटा ने देखते-देखते अपने तेरह ग्रामीणों के लाश को कंधा दिया है,हल्की सर दर्द-बुखार के चपेट में आ कर लोग मर जा रहें है,कोरोना जाँच की व्यवस्था पिछले पाँच दिनों से पूरे प्रखंड में नदारद है,मरने वालों की रिपोर्ट आने से पहले उनकी मृत्यु हो जा रही है,हॉस्पिटल के नाम पर एक मात्र प्राणरक्षक नाजरेथ है,जहाँ सुविधाएँ गुल है ।

बकौल औंटा के साथियों के माने तो मरने वालों में एक बात कॉमन है वो है सभी ने गाँव के ठाकुरबाड़ी में सामूहिक ढंग से चलें वैक्सिनेशन कैम्प मे दस दिन पहले वैक्सीन का पहला डोज लिया था,उसके बाद से ही उनकी हालत बिगड़ती गयी और अब आंकड़ा ये है कि उस 300 सौ में से 13 लोग सिस्टम की मौत मारे जा चुके हैं, चार दिन पहले एक ही परिवार के दो लोगो की मौत के बाद लोगो को मामले की गंभीरता समझ आयी । कहा जा रहा है कि वैक्सीन को तो उपयोग में लाने से पहले ना तो फ्रिज किया गया था और ना ही इसके पड़ने वाले प्रभाव के बारे में लोगों को अवगत करवाया गया, ना तो सोशल डिस्टेंसिंग था ना मास्क की औचक व्यवस्था, कथित तौर पर अंडविशेष सरकार ने रिकॉर्ड चमकाने के चक्कर मे गुणवक्ता को प्रभावित करते हुए पूरे गाँव के बाप-दादा को मौत के मुहाने पर पहुँचा दिया..

अब मोकामा प्रखण्ड के बीडीओ कहते हैं मरने वाले लोगो की वजहें कुछ और है,ना तो ये वैक्सीन की अनिमितता से मरें और ना कोरोना से ,क्यों कि कोरोना की जाँच बंद है और वैक्सीन से मरने का सवाल नही है,बिना किसी भी प्रकार के जाँच और टैस्टिंग के तंत्र अपनी जिम्मेदारी से मुह मोड़ चुका है । बीडीओ साहब के आँख में पानी होता तो कम से कम जाँच जरूर करवाई जाती की अचानक से आखिर इतना लाश गिरा कैसे?

खैर इस व्यपाक मृत्यु कांड के बाद भी ना तो विधायक के प्रतिनिधि पहुँचे और ना ही सांसद,अफसरशाही के मद में चूर अधिकारी कहते हैं मुझे इस एवज में कोई जानकारी नही,औंटा के ग्रामीण भय के साये में जीने को मजबूर हैं,व्यवस्था दूर खड़ी हो कर मुह चिढ़ा रही है,सेनिटाइज करवाने के लिए पैरवी लगवाई गयी है,उम्मीद है फ़ला बाबू के चीला लोग आ कर फ़ोटो बाजी भी कर जाएंगे…

औटा के आस पास के लोगो को साथ आना चाहिए,असमय पड़े इस विपदा को बाँटा नही जा सकता है पर बोझ जरूर कमाया जा सकता है, काल के गाल में समाये उन सभी को नमन जिन्हें हमसे छीना गया है…

मोनू सिंह की कलम से…..

टिप्पणियाँ बंद हो जाती हैं, लेकिन Trackbacks और Pingbacks खुले हैं।