जानिए, वन देवी से दुर्गा पूजन के लोकउत्सव का रहस्य

वन देवी से दुर्गा देवी बनने का लोकउत्सव

शरद ऋतु की शीतल बयार अपने साथ उत्सवी आनंद का रूप लेकर आती है। खासकर पूर्वी भारत में दुर्गा पूजा से आरंभ होने वाला उत्सवों का महीना छठ तक समान रूप से चलता है। यह ऐसी अवधि है जिसमें हम सीधे तौर पर अलग अलग कारणों से प्रकृति के करीब जाते हैं और समाज को एकजुट होकर उत्सवधर्मी बनने का मौका मिलता है।

विशेषकर बंगाल के इतिहास पर गौर करें तो दुर्गा पूजा को लेकर कई प्रकार की मान्यताएं हैं। कई इतिहासकारों ने अपने शोध उपरांत दुर्गा पूजा की गैर-वैदिक जड़ों की व्याख्या की थी। उनके अनुसार आरंभिक दौर में दुर्गा पूजा का स्वरूप भिन्न था, यानी दुर्गा की पूजा आदिवासी समाज अपनी एक वन देवी के रूप में करता था। े छठी शताब्दी में सर्वप्रथम आदिवासियों की वनदेवी की पूजा जंगलों से बाहर के समाज में होने लगी। बाद में १६वीं के आते आते दुर्गा पूजा लोकउत्सव के रूप में पूरे बंगाल प्रांत में मनाया जाने लगा।

छठी सदी से १६वीं सदी के बीच में विभिन्न भारतीय रियासतों की जो अधिष्ठात्री देवी रहीं उनके नाम भी बदलकर दुर्गा हुए। जैसे चामुंडा, चामुंडेश्वरी, ज्योतिदेवी, राजाराजेश्वरी, मोकाम्बिका, वैष्णवी, काली, बाला त्रिपुर सुंदरी, बनशंकरी, जगधात्री आदि नामों से पूजी जाने वाली देवियां दुर्गा नाम से प्रचलित हुई और 18वीं सदी से शरद ऋतु में बंगाल के हर भूभाग में अलग अलग तरीके से दुर्गा पूजा का सार्वजनिक विधान होने लगा, यानी यह लोकउत्सव बन गया।

वैसे, भारतीय इतिहास पर गौर किया जाए तो देवी पूजा की परंपरा क्षत्रिय आधारित रही। यानी राजपरिवारों की अधिष्ठात्री कोई न कोई देवी रही, जो बाद में हर जगह एकीकृत रूप से दुर्गा नाम से प्रचलित हुई।

हालांकि बंगाल और शेष भारत में दुर्गा पूजा का स्वरूप भी अलग रहा। इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि 18वीं सदी के उत्तरार्ध से दुर्गा पूजा बंगाल के बेटों में देशभक्ति की भावना जागृत करने का रूप बन गया जो उसके पूर्व तक बंगाली व्यापारियों के बीच सीमित रहने वाला धार्मिक उत्सव था। हालांकि अंग्रेजों और मुस्लिम शासकों के शोषण के प्रतिकार में समाज को एकजुट करने में दुर्गा पूजा की अहम भूमिका रही। दुर्गा पूजा के बहाने बंगाल में समाज के हर वर्ग ने एकजुटता दिखाने की कोशिश की और धीरे धीरे यह बंगाल का प्रतीक और प्रतिबिंब बन गया।

बंगाल में इसकी शुरूआत भी 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में हुई। तब तक बंगाल में नवाब ने मुगल शासकों के साथ संबंध तोड़ दिया और इस क्षेत्र में हिंदू जमींदारों का एक वर्ग पैदा हुआ। हिंदू भूस्वामियों का यह वर्ग अपने आप को आम जनमानस के बीच लोकप्रिय करना चाहता था। इसी कारण उन्होंने समाज के बहुधा वर्ग से खुद को जोडऩे, विशेषकर हिंदुओं को एकजुट करने के लिए दुर्गा पूजा का सहारा लिया। नवाबों के सामांतर सत्ता विस्तार कर रहा हिंदुओं का यह वर्ग हर वर्ष दुर्गा पूजा के रूप में अपने सामर्थय को भी दर्शाता और 1757 में जब अंग्रेजों ने पलासी का युद्ध जीता उसके बाद बंगाल पर अपने शासन विस्तार के लिए उन्हें हिंदू जमींदारों की जरूरत थी। नवाबों के विरोध और हिंदू जमींदारों के साथ समाज को जोडऩे में तब दुर्गा पूजा की अहम भूमिका रही। इसी दौर में यह बंगाल में लोक उत्सव के रूप में तेजी से बढ़ा जो आज तक पूरे पूर्वी भारत में विद्यमान है।

वहीं, शेष भारत मेें दशहरा या दुर्ग पूजा सिर्फ राजउत्सव के रूप में रहा। जैसे मैसूरु, हिमाचल, राजस्थान के कुछ राजवाड़े आदि में सिर्फ राजा द्वारा देवी पूजा की जाती थी और प्रजा को उस समय राजा के आयोजन को देखने मात्र से मतलब था। संयोग से यह परंपरा आज भी महसूस कर सकते हैं। जहां पूर्वी भारत में दुर्गा पूजा लोकउत्सव है वहीं शेष भारत में इसका भिन्न स्वरूप है।

बाकी उत्सव ही समाज को जोड़ता है। हम उत्सव प्रिय भारतीय इन्हीं विविधताओं से जुड़े हुए हैं। इन्हीं में हमारी जड़ें मजबूत होती हैं। यही हमारे इंद्रधनुषी भारत की पहचान है, इस बहुरंग को हम बचाए रखें।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

टिप्पणियाँ बंद हो जाती हैं, लेकिन Trackbacks और Pingbacks खुले हैं।