मोकामा
संपादकीय

जिन्हें जीना है वतन के लिए वो मौत को भी मार आते है,माँ भारती का लाल राजशेखर सेवा को तैयार

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भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में कुछ समय पहले सैन्य अधिकारियों की ट्रेनिंग के तहत ‘पहला क़दम’ कार्यक्रम हो रहा था, जिसमें सभी कैडेट्स को पीठ पर भारी-भरकम बोझ रख कर दस किलोमीटर की दौड़ लगानी होती है।इस लम्बी दौड़ के वक़्त एक कैडेट धड़धड़ा कर नीचे गिर पड़ा डिहाइड्रेशन के कारण। आननफानन उस कैडेट को देहरादून के सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया। तब सब के होश उड़ गए जब बताया गया कि उस कैडेट को ‘मल्टी ऑर्गन फेलियर’ हुआ है..कैडेट की किडनी और लिवर को 70% नुक़सान हुआ था..!!डॉक्टर्स ने ट्रेनिंग दे रहे सैन्य अधिकारियों को बता दिया कि इस कैडेट के बस गिनती के अब दिन रह गए हैं। अब यह बचेगा नहीं। डॉक्टर्स ने इस कैडेट को अब बिल्कुल भी ट्रेनिंग को जारी रखने से मना कर दिया..!!

उसी बैच में पहले ही दो कैडेट्स की कड़ी ट्रेनिंग के मध्य मृत्यु हो चुकी थी, सो ट्रेनिंग देने वाले सैन्य अधिकारी और भी सकते में आ गए क्योंकि भारतीय सेना की ट्रेनिंग दुनिया में सबसे कठिन में से एक मानी जाती है और इससे समझौता बिल्कुल भी नहीं किया जाता।आज भी भारतीय सेना में लगभग 8,000 अधिकारियों की कमी है क्योंकि भारतीय सेना अपनी गुणवत्ता से बिल्कुल भी समझौता नहीं करती और न ही इस स्तर पर किसी को कोई आरक्षण देती है क्योंकि देश की सुरक्षा के साथ मज़ाक नहीं किया जा सकता..!!यह जो कैडेट सैन्य अस्पताल में भर्ती था, इसे कुल 40 दिन वहाँ रखा गया। 18 दिन ‘इंटेंसिव केअर यूनिट’ में और 22 दिन ‘हाई डिपेंडेंसी यूनिट’ में..!! इस दौरान कैडेट की माँ और एकमात्र भाई उसके साथ बने रहे और बस इस आशा में थे कि चिकित्सकों द्वारा हाथ खड़े कर दिये जाने के बावजूद उनका लाडला किसी तरह बच भर जाए और उसे वो लेकर घर चले जाएं..इधर अस्पताल में भर्ती और चिकित्सकों द्वारा हाथ खड़े कर दिए जाने के बावजूद कैडेट के मन में कुछ और ही चल रहा था। सेना में जब वह अधिकारी चुना गया था, तो उसका बचपन का सबसे बड़ा सपना पूरा हुआ था क्योंकि वह पैसे के लिए महज़ एक नौकरी नहीं पाना चाहता था, परन्तु वह सच में भारतीय सेना में शामिल होकर ‘माँ भारती’ की सेवा करना चाहता था..!!

कैडेट और उसका एकमात्र भाई जब स्कूल में ही थे, तभी उसके पिता वर्ष 2005 में दुनिया छोड़ कर चले गए। पिता का साया क्या हटा, गोया दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा था। कैडेट की माँ शान्ति देवी जी ने तब दूसरों के कपड़े सिल-सिल कर अपने दोनों बच्चों को किसी तरह पढ़ाया..गुज़र-बसर किया..!!इन्हीं कठिन परिस्थितियों से निकल कर तमिलनाडु के मदुरई जिले के मैदानबित्ति गांव का राजशेखर एक दिन अपनी कड़ी मेहनत व लगन के दम पर भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में शामिल हुआ। पर अभी नियति को उसकी और कड़ी परीक्षा लेनी थी..अस्पताल में जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहे कैडेट राजशेखर के समक्ष सब कुछ रील की तरह घूम रहा था। अदम्य जिजीविषा का धनी राजशेखर अचानक से उठ खड़ा हुआ। उसने मन ही मन निर्णय ले लिया था..मेडिकल साइंस एक तरफ़..कैडेट राजशेखर का जुनून एक तरफ़..!!सैन्य अस्पताल के चिकित्सकों, अपने माँ-भाई सबके सुझावों को सिरे से दरकिनार कर कैडेट राजशेखर ने जिम में रोज़ 4 घण्टे पसीना बहाना शुरू किया। बचपन की कठोर परिस्थितियों में तप कर कुन्दन बन चुके इस अद्भुत मानव के अदम्य साहस के सामने भला यमराज भी क्या टिकते..??!!ज़िन्दगी जीत गयी थी, तयशुदा मौत हार गयी थी..वाह रे धरतीपुत्र राजशेखर..धन्य है वह मिट्टी जिसने तुझ जैसे शेर को जन्म दिया..!! आभार उस आदरणीया माँ का जिन्होंने परिस्थितियों का बहाना नहीं बनाया, वरन कठोर मेहनत किया अत्यधिक विपरीत समय में..!!

अभी परसों यानी 9 जून 2018 दिन शनिवार को जेंटलमैन कैडेट राजशेखर की ट्रेनिंग मुकम्मल हुई। भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून के कंपनी कमांडर और प्लाटून कमांडर का भरपूर सहयोग ट्रेनिंग के दौरान लेफ्टिनेंट राजशेखर को मिला। लेफ्टिनेंट राजशेखर की पहली ही नियुक्ति ’12 असम रेजिमेंट’ के तहत दुनिया के सर्वाधिक ऊँचे युद्ध स्थल सियाचिन पर हुई है, जिसे लेकर वह खासे उत्साहित हैं..!!मेरा सलाम जेंटलमैन कैडेट लेफ्टिनेंट राजशेखर को..उन्होंने साबित कर दिखाया कि मानव चाह ले तो क्या नहीं हो सकता, बस जरूरत है हिम्मत, जज़्बे व सकारात्मक नजरिये की..भारतीय सैन्य अकादमी की तरफ़ से लेफ्टिनेंट राजशेखर को ‘बेस्ट मोटिवेटर’ अवॉर्ड प्रदान किया गया..जिस देश में ऐसे रणबाँकुरे जन्म लेंगे, कौन देख सकता है फिर हमारे देश को टेढ़ी निगाहों से भी..!!👍👌..जयहिन्द..!!🇮🇳- कुमार प्रियांक
(तस्वीर में अपनी आदरणीया माँ और भाई के साथ 9 जून 2018 को भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में पासिंग आउट परेड के बाद लेफ्टिनेंट राजशेखर..🙏)