मोकामा
संपादकीय

तारापुर शहीद दिवस

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स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा बलिदान अनदेखा न रह जाए ! #TarapurShahidDiwas देश को आजादी कितनी कुर्बानियों के बाद हासिल हुई है, इसका अंदाजा शायद नई पीढ़ी को नहीं होगा. इसमें उनका दोष भी नहीं है. वे आजाद भारत में पैदा हुए हैं और बिल्कुल अलग परिवेश में जी रहे हैं. इन 70 वर्षों में काफी कुछ बदल चुका है. लेकिन तब यह है कि उन्हें इस बारे में बताया जाना चाहिए कि यह आजादी कितनी मुश्किलों का सामना कर हमें हासिल हुई है. बात अगर सेनानियों की करें तो हम उन लोगों को तो जानते हैं जिनकी इतिहास में खूब चर्चा हुई है लेकिन उन सेनानियों के बलिदान के बारे में नहीं जानते हैं जो आज आजादी के 70 साल बाद भी कहीं गुमनामी के अंधेरे में खोए हुए हैं. उन्हें या तो भूला दिया गया है या फिर वे हाशिये पर डाल दिए गए. कई सेनानियों का तो कुछ अता पता भी नहीं मालूम क्योंकि उनके बारे में कभी कुछ ज्ञात ही नहीं हो पाया. अब इसे ही लीजिए, शायद किसी को पता हो भी या न हो कि आजादी की लड़ाई में बिहार के तारापुर का गोलीकांड कितनी महत्वपूर्ण घटना थी.

इस घटना की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, शायद उतनी हो नहीं पाई है. आपको बता दें कि तारापुर बिहार के मुंगेर जिले का एक अनुमंडल है. यह कस्बानुमा शहर 15 फरवरी 1932 को हुए भीषण नरसंहार के लिये प्रसिद्ध है. आजादी के दीवाने स्थानीय ग्रामीणों ने तारापुर थाना भवन पर तिरंगा फहाराने के संकल्प को पूरा करने के लिए सीने पर गोलियां खायी थीं और वीरगति को प्राप्त हुए थे. 1931 के गांधी इरविन समझौते को रद्द किये जाने के विरोध में कांग्रेस ने देश में सभी सरकारी भवनों से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने का आह्वान किया था और यह जनांदोलन का रूप ले चुका था. मुंगेर जिले का तारापुर जो उस समय बस एक छोटा-सा बाजार था, भी इससे अछूता नहीं था. घटना के साक्षी एवं योजना के भागीदार रहे बुजुर्गों के अनुसार शंभुगंज थाना के सुपौर जमुआ के श्री भवन में तारापुर थाना भवन पर तिरंगा फहराने की पूरी रूपरेखा तैयार की गई थी. 15 फरवरी 1932 को इसी सिलसिले में आसपास के गांवों के आजादी के हजारों दीवानों ने यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने के संकल्प के साथ तारापुर में अंग्रेजों के थाने पर धावा बोला था. जोशीले सेनानी ‘भारत माता की जय’ और ‘बंदे मातरम’ का जयघोष कर रहे थे. तब उस वक्त के कलेक्टर ई.ओ. ली व एसपी डब्लू फ्लैग ने निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दी थी.

आजादी के दीवाने नौजवान वहां से हिले नहीं और सीने पर गोलियां खायीं. अंग्रेजी हुकूमत की इस बर्बर कार्रवाई में 44 स्वतंत्रता प्रेमी शहीद हो गये थे. इनमें से 13 की तो पहचान हुई बाकी 31 अज्ञात ही रह गये थे. आनन—फानन में अंग्रेजों ने कायरतापूर्वक वीरगति को प्राप्त कई सेनानियों के शवों को वाहन में लदवाकर सुल्तानगंज भिजवाकर गंगा में बहवा दिया था. जिन 13 वीर सपूतों की पहचान हो पाई उनमें विश्वनाथ सिंह (छत्रहार), महिपाल सिंह (रामचुआ), शीतल (असरगंज), सुकुल सोनार (तारापुर), संता पासी (तारापुर), झोंटी झा (सतखरिया), सिंहेश्वर राजहंस (बिहमा), बदरी मंडल (धनपुरा), वसंत धानुक (लौढिया), रामेश्वर मंडल (पढवारा), गैबी सिंह (महेशपुर), अशर्फी मंडल (कष्टीकरी) तथा चंडी महतो (चोरगांव) शामिल थे. इस घटना ने अप्रैल 1919 को अमृतसर के जालियांवाला बाग गोलीकांड की बर्बरता की याद ताजा कर दी थी. बीर सेनानियों की कुर्बानियों को याद दिलाने के लिए तारापुर थाना के ठीक सामने स्थानीय नेता व समाजसेवी जयमंगल सिंह शास्त्री, जमुना पासवान, बासुकीनाथ राय, नंदकुमार सिंह, नंदकिशोर चौबे, डॉ. जीवानंद मिश्र, डॉ. दामोदर चौधरी, हितलाल राजहंस आदि के प्रयासों से शहीद स्मारक स्थल बना. 1984 में बिहार के पूर्व मुख्यसमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने शहीद स्तंभ को संगमरमर का बनवा दिया था.

लेकिन इस स्थल को जितना भव्य होना चाहिए था, आज उसका शतांश भी नहीं है. स्थानीय युवा एवं भारतीय जनयुवा मोर्चा के कार्यकर्ता जयराम विप्लव के प्रयासों से तारापुर गोलीकांड के बारे में लोग थोड़ा बहुत जान भी पाए हैं वरना वीरसपूतों की कुर्बानियां गुमनामी के अंधेरे में ही खोई रहतीं. जयराम विप्लव उस थाना भवन को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मुहिम छेड़े हुए हैं जिस भवन पर तिरंगा फहराने के प्रयास में भारत मां के वीर सपूतों ने शहादत दी. स्थानीय सोनडीहा (स्वर्णडीह) निवासी एवं आरएस कॉलेज के उस समय इतिहास विभाग के प्रवक्ता तदुपरांत प्राचार्य बने डॉ. देवेंद्र प्रसाद सिंह ने तारापुर के वीर शहीदों पर शोध प्रबंध लिख इस ऐतिहासिक घटना को प्रकाशित किया. इतिहासकार डीसी डिन्कर ने अपनी पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम में अछूतों का योगदान’ में तारापुर के वीर शहीद संता पासी और शीतल चमार का उल्लेख किया है.तथा बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन इतिहास पुस्तक में खंड दो में तारापुर गोलिकांड कीं विस्तृत चर्चा है. प्रत्येक वर्ष 15 फरवरी को तारापुर शहीद दिवस का आयोजन होता है. इस मुद्दे को अपने कार्यक्रमों और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक ले जाने की मुहिम के अगुआ जयराम विप्लव ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में १५ फ़रवरी १९३२ का दिन स्वर्णाक्षरों में अंकित है । अंग्रेज़ी थाने पर तिरंगा फहराते हुए हमारे अंग क्षेत्र के ३४ वीरों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी । तारापुर गोलिकांड के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने कहा था – “ कहाँ है तारापुर ? इसे दुनिया के नक़्शे से मिटा दो । “ उस महान बलिदान का जीवित गवाह आज भी तारापुर के ऐतिहासिक थाना भवन के रूप में मौजूद है । हम सरकारों से लगातार माँग करते रहे हैं कि इस भवन को “राष्ट्रीय धरोहर “का दर्जा मिले और थाना भवन के नाम के आगे ‘ ऐतिहासिक ‘ शब्द जोड़ते हुए इसे संरक्षित किया जाए । अब तक हमें आश्वासन हीं मिला है । आने वाले १५ फ़रवरी को आसपास के दस जिलों के राष्ट्रभक्त इककठे होकर हमारी माँग के समर्थन में अपनी आवाज़ बुलंद करेंगे ।