भ्रातृभाव से सुवासित ब्रह्मर्षि महाभोज ने दी बुजुर्गों के सम्मान की सीख

मोकामा। पेशेवर एवं व्यक्तिगत मजबूरियों और चुनौतियों की वजह से धीरे धीरे सामूहिक रूप से जीने वाला समाज एकल स्वरूप में बंटता जा रहा है। मोकामा जैसे जगह जहां पुरानी पीढी के लोग मोलदियार टोला से लेकर पचमहला, औंटा तक के निवासियों से परिचित रहते थे वहीं हाल के वर्षों के दौरान हम अपने पड़ोसियों को भी नहीं पहचानने लगे हैं। स्थिति इतनी दयनीय हो चली है कि हम आसानी से लगभग हर घर में बुजुर्गों की अवहेलना देख सकते हैं। ऐसे में कुछ आयोजन नजीर पेश करते हैं जो भले ही एक कुरीति का रूप हो लेकिन दूसरी नजर से देखें तो समाजिक समरसता, सौहार्द, अपनत्व भाव, एकता, सुख-दुख के साथी बनने की सीख मिलती है।

कीर्तिशेष रामकिशुन बाबू की धर्मपत्नी उमादेवी के देवलोक गमन पर मोलदियार टोला, मोकामा में ऐसी ही समरसता की मिसाल देखने को मिली। उमादेवी की पावन स्मृति में 4 एवं 5 अप्रैल को हुआ मोलदियार टोला ब्रह्मर्षि महाभोज कई मायनों में अहम रहा जो सिर्फ खाने-खिलाने का आयोजन मात्र नहीं था बल्कि सामाजिक बंधुत्व की भावना को साकार करने में सफल रहा। हालांकि किसी की मृत्यु पर महाभोज के इस प्रकार के आयोजन को लेकर समाज में विरोधाभास भी है, विशेषकर युवा पीढी में और होना भी चाहिए लेकिन महाभारत में एक घटना का जिक्र है कि जब कौरवों और पाण्डवों के बीच युद्ध होने वाला था तब भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को युद्ध न करके सन्धि करने का आग्रह किया। दुर्योधन ने उनका आग्रह ठुकरा दिया। श्रीकृष्ण को कष्ट हुआ और वे वहाँ चल पड़े तो दुर्योधन ने उनसे भोजन करने का आग्रह किया। इस पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा – सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुन:। अर्थात जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो और खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए। सुखद संयोग यह है कि महाभोज में खिलाने वाले का मन प्रसन्न था न कि आयोजक पर कोई सामाजिक दबाव, इसलिए खाने वालों में भी प्रसन्नता रही। आयोजन के दौरान 4 अप्रैल को एक बेहतरीन और अनुकरणीय पहल हुई जिससे हर पीढी को सीखने लेने की जरुरत है। ‘वयोवृद्ध अभिनंदन’ के तहत समाज के कई बुजुर्गों का शॉल ओढाकर सम्मान किया गया। एक ओर जहां समाज में बुजुर्ग हमारे ही घरों में उपेक्षित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक रूप से बुजुर्गों का सम्मान किया जाना एक अनुकरणीय मिसाल है। सभी को सीखने की जरुरत है कि ये बुजुर्ग हमारे आधार स्तंभ हैं और हम आज भले युवा और प्रौढ हैं लेकिन अंत हमारा भी बुजुर्ग बनकर ही होगा, इसलिए उन्हें उपेक्षित न करें बल्कि घर और बाहर हर जगह उन्हें सम्मान देना और उनकी सेवा करना अपना कर्तव्य समझें। यही मानवीय गुण है। इसमें ईश्‍वरीय आशीष है। संयोग से यह लगातार दूसरा मौका रहा जब मोलदियार टोला में वयोवृद्ध जनों का ऐसा सम्मान किया गया। पिछले वर्ष भी 3 एवं 4 जुलाई 2017 को स्वतंत्रता सेनानी परमेश्‍वरी बाबू की धर्मपत्नी सत्यभामा देवी की पावन स्मृति में इसी प्रकार का ब्रह्मर्षि महाभोज आयोजित हुआ था जिसमें कई लोगों का सम्मान किया गया था। जरुरी है इसे हम सिर्फ आयोजन के रूप में न अपनाएं बल्कि अपने घरों में बुजुर्गों को सम्मान ेदें।

महाभोज पर मोकामा के ‘मेरा आंगन-मेरा बचपन’ के लेखक आशुतोष आर्य ने लिखा है – मोकामा का अतीत अति समृद्ध व गौरवशाली रहा है । सनातन धर्म और संस्कृति को जीती हुई कश्यप और सांकृत ऋषि की संतति यहाँ वर्षों से भ्रातृभाव के साथ रहती आ रही है। मोकामा की सम्पूर्ण आबादी चार टोलों में विभक्त है । ये टोले हैं — मोलदियार टोला , सकरवार टोला , चिंतामणिचक और धौरानी टोला। चारो टोलों के सहअस्तित्व से ही मोकामा संपूर्णता को प्राप्त करता है। यहाँ के समस्त निवासी एक वाटिका के सुस्मित सुमन हैं। सभी पुष्प अपने-अपने सौरभ से इस मनोज्ञ उपवन को सुवासित कर रहे हैं । कीर्तिमान स्थापित करने वाले हमारे पूर्वजों ने अनेकोनेक कालजयी परंपरा की नींव रखी है। आपसी प्रेम , सद्भाव , सौहार्द व एकता प्रदर्शित करने हेतु उन्होंने एक साथ एक जगह बैठकर भोजन ग्रहण करने की श्रेष्ठतम परंपरा को जन्म दिया है। इस तरह के मोकामा स्तरीय आयोजन को महाभोज तथा टोला स्तरीय आयोजन को वृहतभोज के नाम से जाना जाता है। मोकामा में आजतक कुल 30 महाभोज हो चुके हैं। 17 सकरवार वृहतभोज तथा 2 मोलदियार वृहतभोज का आयोजन भी हो चुका है। मोकामा के जिवेन्द्र कुमार लिखते हैं – भले ही ब्रह्मभोज गलत परंपरा हो लेकिन हमारे पूर्वजों हमें गुणशील बना कर गए हैं। पूर्वजों ने तो ‘डोम’ से आग लेने की परंपरा को भी समाप्‍त कर दिया, ऐसे में भोज करने के लिए दबाव की बात तो संभव ही नहीं है। यही कारण है कि महाभोज हो रहा है तो पूरा गांव उत्साह के साथ जुटा हुआ है लेकिन अगर कोई ब्राह्मण को भी एक दाना न खिलाए तो भी हमारे मोकामा में किसी को आपत्ति नहीं है। ऐसी है हमारी समृद्ध और प्रगतिशील सोच। हालांकि ध्यान देने की बात है कि इस प्रकार के आयोजन प्रतिस्पर्धा न बन जाएं जिसमें जौ के साथ घुन भी पिस जाए।
(साभार – अनिकेत कश्यप)