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कलम और किसान मिलकर करेंगे किसान महाबंदी ,देश के बड़े बड़े पत्रकारों ने किया समर्थन

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अब महज 2 दिन शेष है किसान महाबन्दी को मगर अभी तक भारत सरकार या बिहार सरकार के कानो में जूं तक नहीं रेंगी है.जिस मोकामा बड़हिया टाल से 25 से 50 लाख लोगो का उद्धार हो सकता है उसपर सरकार येसे सोई है ये समस्या किसी दुसरे देश की है.मगर पढ़े लिखे लोग और किसान दिन-ब- दिन अपने आन्दोलन को लेकर संपर्क कर रहे है ,उन्हें जन समर्थन भी अपार मिल रहा है.देश के बड़े बड़े पत्रकार भी इस आन्दोलन के लिए अपना कलां दिन रात चला रहे है.वंही कुछ युवा जो न पत्रकार है न किसान है फिर भी किसानो के दुःख पर अपन्बे कलम से इस आन्दोलन को सफल बनाने में लगे हुए है.आइये देखते है कौन कौन बड़े पत्रकार ने कब कब क्या कहा .

रविश कुमार(एन डी टी वी ):-देश के जाने माने पत्रकार रविश कुमार(एन डी टी वी )ने मोकामा टाल पर एक एपिसोड बना कर देश के कर्णधारो को जगाने की कोशिश की .उन्होंने उस विडिओ में खुले तौर पर कहा की हम किसान क्या सिर्फ आत्महत्या के लिए बने है.देश को अगर इतना दलहन उपजा कर देने वाला किसान आज भूख मर रहा है तो जिम्मेदार कौन.2016 की नोटबंदी के समय किसानों ने उच्च मूल्य पर चना व मसूर के बीज खरीदे(लगभग 12000रूपये प्रति क्विंटल) । उस समय सरकार ने मसूर का 4250 रूपये प्रति क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया। किसानो को लगा दाल उत्पादन का उचित लाभ व प्रतिफल मिलेगा। दाल की पैदावार भारत के दाल खपत व मांग के अनुरूप रही तथा फसल उत्पादन अच्छा रहा। इधर सरकार ने हाल के वर्षों में शून्य आयात शुल्क पर इतना दाल आयात कर लिया कि अब भारत के किसान (खासकर बिहार ) मे दाल कौडियों के भाव भी नहीं है। दाल की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पूरे बिहार में कहीं भी नहीं रही।बिहार के अंदर दाल खरीद को लेकर राज्य सरकार या केंद्र सरकार के पास कोई मैकेनिज्म नहीं है। बिहार में संपूर्ण टाल क्षेत्र के किसानो के दाल दो साल से रखे हैं और कोई भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने को तैयार नहीं है। राज्य सरकार दाल खरीदने से साफ इन्कार कर रही है। मूल समस्या यह है कि कृषि मजदूरों ने जिनके अपने खेत नहीं होते ,दस हजार रूपये प्रति बिघा पट्टा पर किराये पर लेकर खेत बोया है। हालत यह है कि कृषि मजदूर अपना घर भी बेच दें तब भी पट्टे की रकम नहीं पूरा कर सकता। छोटे कृषक व कृषि मजदूर दाल के एम एस पी नहीं मिलने के कारण कर्ज के जाल में भयावह रूप से फंस गये है। कोई रास्ता नहीं है आत्महत्या के सिवाय या फिर पलायन करके दिल्ली, मुम्ब ई व सूरत चले जाएं। भारत सरकार द्वारा जारी न्यूनतम समर्थन मूल्य सिर्फ पंजाब ,हरियाणा ,महाराष्ट्र व पश्चिमी यूपी के गेहूं व धान तक सीमित है। जिस किसान.के दो दो साल से फसल नहीं बिके हो ,हालत कल्पना के परे है।

पियूष मित्र(इंडिया स्पीक):-इंडिया स्पीक के पियुस मित्र लिखते है ‘इन दिनों जब आप पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत पर सवाल करेंगे तो सरकार के मुफ्तिया सिपाही आपको दाल की कीमतों का हवाला देंगे. वे कहेंगे कि दाल सस्ती है, यह नहीं दिखता, पेट्रोल महंगी हो गयी उस पर शोर मचाने लगते हैं. यह सच है कि कभी दो सौ रुपये किलो बिकने वाली दाल 60-70 रुपये किलो बिक रही है. कुछ दालों की कीमत तो 50 रुपये तक पहुंच गयी है. मगर किसकी कीमत पर… ?आप नहीं समझ रहे तो आइये आपको एक खबर सुनाते हैं. बिहार में मोकामा टाल के किसानों ने इसी महीने की 28 तारीख को बंदी का ऐलान किया है. वे सड़क मार्ग, रेल मार्ग और सरकारी दफ्तर बंद करायेंगे. वजह दाल की घटती कीमत है. कई सालों बाद बिहार के किसानों के इस तरह सड़क पर उतरकर आंदोलन करने की खबर सामने आयी है. जो लोग मोकामा की भौगोलिक स्थिति से परिचित हैं, वे समझते होंगे कि इस बंदी का मतलब क्या है. करीब 100 किलोमीटर क्षेत्र के दर्जनों गांवों के लोग सड़क पर प्रदर्शन करने की तैयारी में हैं. किसानों की इस महाबन्दी से बिहार की रफ्तार थम जाएगी. उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला राजेन्द्र सेतु पूरे दिन बन्द रहेगा. पूर्व और पश्चिम बिहार भी सड़क और रेल सम्पर्क से पूरी तरह कटा रहेगा.क्यों गुस्से में हैं मोकामा टाल के किसान? दलहन इस इलाके की प्रमुख फसल है और इसकी खेती से ही इन किसानों का जीवन चलता है. किसानों का यह प्रदर्शन दलहन फसलों की उचित कीमत न मिलने के विरोध में है. पिछले साल केंद्र सरकार ने दलहन फसलों का न्यूनतम मूल्य तय कर दिया था. यह चार हजार से चौवालिस सौ रुपये प्रति क्विंटल के बीच है. मगर बाजार में जिस तरह दाल 50 से 70 रुपये किलो बिक रहा है, इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किसानों की दाल की कितनी कीमत मिलती होगी. किसान बताते हैं कि दलहन की सरकारी खरीद तो बिहार में कहीं नहीं होती है, उन्हें तो इस न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी एक हजार रुपये कम में खुले बाजार में दाल बेचना पड़ रहा है.

निराला विदेशिया(तहलका) :-28 मई को बिहार के एक हिस्से में बंदी की घोषणा है. यह बंदी
खास कारण से है. यह बंदी मोकामा—बड़हिया टाल के इलाके में हैं. जो बिहारवाले हैं वे जानते होंगे कि यह इलाका क्यों मशहूर रहा है देश भर में. हालिया वर्षों में मोकामा की पहचान की रेखा को बदलने की कोशिश हुई है लेकिन यह इलाका दलहन के लिए ही जाना जाता रहा है. इसी इलाके में आनेवाले मोकामा बड़हिया टाल क्षेत्र के किसान दलहन की उचित कीमत न मिलने से परेशान होकर 28 मई को सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करने वाले हैं. इस दिन किसान संगठित होकर रेल जाम करेंगे और सभी सरकारी कार्यालयों को बंद करायेंगे. मोकामा टाल का जो इलाका है, उससे करीब 100 किलोमीटर क्षेत्र के दर्जनों गांवों जुड़े हुए हैं. यह बंदी होगा तो मोकामा इलाके में लेकिन असर बिहार के दूसरे हिस्से में भी पड़ेगा और पड़ना भी चाहिए. उस दिन राजेंद्र पुल को बंद करवाया जाएगा. किसानों का यह प्रदर्शन दलहन फसलों की उचित कीमत न मिलने के विरोध में है. इस समय देश में मसूर, चना, तूर जैसे दालों की कीमत 70 से 90 रुपए किलो के बीच है लेकिन इनमें अधिकांश दालों का आयात किया जा रहा है इसका सीधा असर दलहन उत्पादक किसानों पर पड़ा है. भारत सरकार ने मोजाम्बिक सहित कुछ देशों के साथ वर्ष 2022 तक के लिए दाल आयात का करार किया है इससे देश में दलहन उपजाने वाले किसानों के समक्ष भुखमरी की नौबत आ गई है. मसूर और चना का मौजूदा बाजार भाव 3500 से 4500 रुपए प्रति क्विंटल है जबकि खेती का लागत मूल्य डेढ़ से दोगुना तक है. उस पर सरकार ने दलहन खरीद के लिए कोई एमएसपी भी तय नहीं किया है यानी किसान बाजार के हाथों परेशान हैं. स्थिति इतनी विकट है करीब 6.5 लाख बीघा वाले मोकामा बड़हिया टाल के कई किसानों ने पिछले दो साल से अपना फसल नहीं बेचा है.

उमेश कुमार राय (आउटलुक):-सरकार ने मसूर दाल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4250 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, लेकिन व्यापारी 3200 से 3500 रुपये से ज्यादा देने को तैयार नहीं । ऐसे में हम करें, तो क्या करें!’ जलजमाव और सूखाड़ के अलावा एक और बड़ी समस्या यहां के किसानों के माथे पर हर साल शिकन ला देती है। वह है दाल की फरोख्त के लिए मार्केट का न होना। मोकामा टाल क्षेत्र में ऐसे किसानों की संख्या सैकड़ों में है जो अच्छी कीमत नहीं मिलने के कारण पिछले साल की दाल अब तक रखे हुए हैं।यहां यह भी बता दें कि मोकामा टाल क्षेत्र की प्रकृति ऐसी है कि साल में एक ही फसल की खेती हो पाती है – रबी के सीजन में। बाकी समय टाल क्षेत्र में पानी की किल्लत रहती है। इस वजह से यह वृहत्तर भूभाग 6 महीने तक यों ही उदास पड़ा रहता है। किसान चाहते हैं कि कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जाये, ताकि वे खरीफ सीजन में भी खेती कर सकें।

विनायक शर्मा(ग्रामीण ):-देश के तीसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था। लेकिन आज किसानों की दशा हमारे देश में क्या है, ये सभी को पता है। कोई भी नवयुवा आज स्वेच्छा से किसान नहीं बनना चाहता। कारण स्पष्ट है, पिछले साल मई महीने में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी थी कि वर्ष 2013 के बाद से अब तक प्रत्येक वर्ष लगभग 12000 किसानों की आत्महत्या की रिपोर्ट दर्ज की गयी है। ध्यान रहे, 12000 किसान प्रति वर्ष आत्महत्या कर रहे हैं, ऐसा रिपोर्ट में है; वास्तव में ये आँकड़ा क्या होगा, इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। तो फिर बताइये कैसे हो ‘जय किसान.सरकार ने दलहन के लिए 2017-18 में किसानों के लिए समर्थन मूल्य तो 4250 रूपये प्रति क्विंटल तय तो कर दिया, लेकिन खरीदी हो नहीं रही। मजबूरन, किसानों को अपना उपजाया अनाज बेचने के लिए बाजार का मुँह ताकना पड़ रहा है; जहाँ उनकी फसलों का खरीद मूल्य सरकार के समर्थन मूल्य और खेती में लगे उनके लागत से भी बहुत कम है। अब जबकि हर साल लगातार यही स्थिति बनती जा रही है; किसान अपना लागत मूल्य भी नहीं कमा पा रहे हैं; ऐसे में किसानों के पास आत्महत्या के अलावा और दूसरा रास्ता रह नहीं जाता। अपनी इसी बेबसी को लेकर उन्होंने 28 मई को बंद का आह्वान किया है ताकि सरकार के कानों पर जूं रेंगे।

कुमार शानू(ग्रामीण):-दाल का कटोरा कहे जाने वाले मोकामा टाल के बेबस किसान दलहन फसल बेच अपने पसीने के सूखने का इंतज़ार कर रहे हैं वहीं भारत सरकार दाल का आयत मोजाम्बिक सहित कुछ देशों से कर रही है. बाजार में दाल की कीमत किसानो के खेती में लागत से भी कम है. मोकामा टाल के पास देश में दाल संकट को खत्म करने की क्षमता है क्योंकि देश में दालें उगाई जाने वाली कुल 2.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन में मोकामा टाल की भागिदारी 1.16 लाख हेक्टेयर है.हम लड़ेंगे हम जीतेंगे, हम लड़े थे, हम जीते थे !Shall be joining Lakhs of farmers of Mokama Taal, the Pulse Bowl of India, in their protest against failure of government to provide Minimum Support Price(MSP) for pulses.The poor Farmers are holding huge stock with them, as the government of India imports pulses from Mozambique.Mokama Taal spread over 1,062 sq km has the potential to mitigate the pulse crisis as it alone constitutes 1.16 lakh hectares of the total 2.5 crore hectares on which pulses are grown in the country.