अनुभव की बात, अनुभव के साथ

अनुभव की बात, अनुभव के साथ

अनुभव की बात

अनुभव की बात, अनुभव के साथ.” मी टू ” ” मी टू “अभियान पूरे विश्व में जोर पकड़ता जा रहा है।

अनुभव की बात
अनुभव की बात

। लोग चुस्कियां लेकर, मजे ले-ले लेकर इस पर चर्चा कर रहे हैं। पंचसितारा होटलों से चाय की दुकान तक, “मीटू” छाया हुआ है। आम लोग समाचार पत्रों और टेलीविजन के विभिन्न चैनलों पर आंख गड़ाए इस इंतजार में हैं कि नाना पाटेकर, आलोक नाथ, साजिद खान,भूषण कुमार, एमजे अकबर और, और फिर कौन ? किसका होगा अगला नाम ?

अमेरिका की रहने वाली तराना बुर्के के साथ बचपन में शोषण हुआ था। अन्य महिलाओं की कहानी सुनने के बाद साल 2006 में तराना बुर्के ने महिलाओं के साथ हुए, हो रहे शारीरिक शोषण और विभिन्न प्रकार की हिंसा की शिकार महिलाओं की सहायता के लिए “मीटू” अभियान की शुरुआत की।
महानगर हो या गांव, शहर हो या देहात, लोग शिक्षित हो या अशिक्षित, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह मसला हर जगह है। देह का आकर्षण सदा रहा है और वह रहेगा ही।यह सिर्फ मर्दों के साथ है, ऐसा नहीं है। कहने को तो हमारा समाज पुरुष प्रधान कहलाता है, लेकिन यह भी हकीकत है कि ऐसे मामलों में हमेशा दोषी पुरुष को ही माना जाता रहा है। हमने कुछ वर्ष पूर्व प्रोफेसर मटुकनाथ और जूली को पढ़ा था, हमने देश के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ दिग्विजय सिंह और उनकी महिला पत्रकार मित्र के बारे में भी पढ़ा था। इन दोनों मामलों में किसने किसका शोषण किया या फिर किसने किसका इस्तेमाल किया, यह कहना काफी कठिन है। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं, बस फर्क है कि किसी के छप जाते हैं, तो किसी के छुप जाते हैं।

अनुभव की बात
अनुभव की बात

मैं इस बात से इंकार नहीं करता हूं की कई मामलों में कार्यस्थल पर महिलाओं का शोषण होता है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कई महिलाएं सीढ़ी के रूप में पुरुषों का इस्तेमाल कर काफी आगे बढ़ी हैं। मैं यह नहीं समझ पाता कि किसी कार्य स्थल पर यदि कोई महिला इन चीजों का सख्ती के साथ विरोध करें तो फिर भी क्या उसका शोषण संभव है ? आज जिस प्रकार गरे मुर्दों को उखारा जा रहा वह कहां तक उचित है?10 साल 15 साल और 20 साल पुरानी बातों का उल्लेख आज किया जा रहा है। हो सकता है आलोक नाथ ने, साजिद खान ने या एमजे अकबर ने गलती की होगी। इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है। यह जांच का विषय है। लेकिन तब इन मामलों को क्यों नहीं सामने लाया गया ?आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी ? हो सकता है आने वाले समय में हमें कुछ और लोगों के बारे में ऐसी बातों का पता चले।हमसब अपने आस-पड़ोस और समाज में ऐसी कई घटनाओं से वाकिफ हैं। यह हो रहा है और शायद आगे भी होता रहे। मुझे बिल्कुल नहीं लगता कि कानून का सहारा लेकर इसे रोका जा सकता है। इसके लिए महिलाओं को स्वयं मजबूती से प्रयास करना होगा। उन्हें खुद को मजबूत साबित करना होगा, मजबूर नहीं।कहीं परिस्थिति ऐसी ना बन जाए कि आने वाले समय में लोग महिला कर्मचारियों को काम देना ही बंद कर दें।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.