मोकामा
संपादकीयसाहित्य

‘सिमरिया’ के रामधारी ‘मोकामा’ में बन गए ‘दिनकर’

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‘दिनकर’ सूर्य का पर्यायवाची है और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ साहित्य के ऐसे ऊर्जास्रोत थे जिन्होंने अपने साहित्यिक शौर्य की बदौलत खुद को ‘दिनकर’ के रूप में प्रतिपादित किया। यह दिनकर का आत्मविश्वास है कि वह खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करते हैं- “मत्र्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूं मैं।”और दिनकर को खुद में सूर्य की भांति ओजस्वी ऊर्जा देखने की पहली प्रेरणा मिली थी ‘मोकामा’ में। वर्ष -1928 में मोकामा घाट स्थित मोकामा हाई स्कूल से मैट्रिक करने वाले रामधारी सिंह दिनकर जब बाद में साहित्यिक क्षेत्र में शीर्ष विराजित हुए तब उन्होंने अपनी रचनाओं में परशुराम और कर्ण जैसे इतिहास पुरुषों पर केन्द्रित रचनाएं लिखीं। रामधारी सिंह दिनकर के बारे में जब भी चर्चा होती है तब यह तो कहा जाता है कि उन्होंने एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रुप में ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी तथा प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया। लेकिन इस बात की चर्चा कम होती कि दिनकर की इस ओजस्विता के पीछे प्रेरणास्रोत भूमि ‘मोकामा’ रही।

पतित पावनी गंगा के उत्तरी छोर पर बसे सिमरिया घाट की बालू की रेत पर खेलने वाले बालक रामधारी सिंह को ‘दिनकर’ के रूप में सृजित करने का पहला पड़ाव मोकामा ने दिया था। 1920 के दशक में बालक रामधारी सिंह हर दिन नाव और स्टीमर से गंगा पार कर सिमरिया से मोकामा घाट आते थे। मोकामा जो मौजूदा समय में त्रिवेणी संगम है मगध, अंग और मथिला का। मोकामा में पढने के दौरान रामधारी सिंह का मोकामा स्थित परशुराम मंदिर भी जाना होता था। भारत में गिने चुने जगहों पर ही परशुराम के मंदिर हैं जिसमें मोकामा का परशुराम मंदिर सामाजिक समरसता का सूचक है। हाल के वर्षों में एक सामान्य धारणा हो गई कि परशुराम सिर्फ ब्राह्मणों द्वारा पूजित देव हैं जबकि मोकामा में शताब्दियों का इतिहास गवाह है कि ‘भूमिहार से लेकर चमार’ तक परशुराम को पूजते हैं। शायद इसी कारण जब स्कूली शिक्षा के दौरान बालक रामधारी सिंह ने मोकामा में परशुराम के अनुयायियों को भिन्न स्वरूप देखा तब उन्होंने उसे ही आगे चलकर ‘परशुराम’ पर केन्द्रित परशुराम की प्रतीक्षा लिखी। साथ ही अपनी कई अन्य रचनाओं में भी उन्होंने परशुराम के विविध स्वरूपों को प्रतिपादित किया। जैसे मोकामा के परशुराम सबको समेटकर चलने वाले हैं वैसे रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के ऐसे कवि-लेखक हैं, जिनकी ‘रेंज’ इतनी व्यापक है कि वह अपने में साहित्य, समाज, इतिहास और राजनीति को एक साथ समेटकर चलते हैं।दिनकर की पहली प्रकाशित कविता का किस्सा बड़ा अनोखा है। 1920 के दशक में भारत में अंग्रेजों का शासन था और अंग्रेजों के खिलाफ लिखना दंडनीय अपराध। ऐसे में मोकामा घाट स्कूल में पढने वाले बालक रामधारी ने इसे चुनौती के रूप में लिया और स्कूल से प्रकाशित होने वाली वार्षिक पुस्तिका में उन्होंने अंग्रेजों के शासन को चुनौती देने वाली एक ओजस्वी कविता लिख दी लेकिन उन्होंने यह कविता छद्म नाम से लिखी। यानी उन्होंने रामधारी सिंह के नाम से नहीं बल्कि ‘अमिताभ’ ने यह कविता लिखी जिसके प्रकाशन होने के बाद स्कूल प्रबंधन को अंग्रेजी हुकूमत ने खूब खरी खोटी सुनाई। इस प्रकार अपनी पहली प्रकाशित कविता से ही बालक रामधारी ने भविष्य के दिनकर की राह दिखा दी।

हालांकि स्कूल की पुस्तिका में प्रकाशित उस कविता का कोई अंश अब मौजूद नहीं है लेकिन पुराने जमाने में मोकामा में यह किस्सा मशहूर था और दिनकर ने भी अलग अलग मंचों से इसका कई बार जिक्र किया था। बाद के वर्षों में दिनकर की एक और लोकप्रिय कविता की सृजन भूमि मोकामा रही। मोकामा के सुल्तानपुर ग्राम में उन दिनों दिनकर अक्सर साधुबाबू के ‘दालान’ पर बैठते थे। दालान के पास कई पेड़ थे जिनमें से एक पेड़ को एक दिन काट दिया गया और उसके बदले लोहे का खंभा गड़ दिया गया। आधुनिक भारत में यह विद्युतीकरण और मशीनीकरण का दौर था। दिनकर ने जब अपने सामने पेड़ कटा पाया और लोहे के खंभे गड़े देखे तब उन्होंने उसी दालान पर बैठे बैठे कुछ समय में ही एक कविता लिख दी -”

मनुष्य के मशीनों की ओर आकर्षित होने पर आधारित होकर दिनकर ने उस समय यह कविता लिखी थी। दिनकर की रचनाओं की व्यपकता का आलम यह है कि वह गांधी से लेकर मार्क्स तक, आर्य से लेकर अनार्य तक, हिंदू संस्कृति के आविर्भाव से लेकर प्राचीन हिंदुत्व और इस्लाम से लेकर भारतीय संस्कृति और यूरोप के संबंधों तक को परखते हुए विपुल लेखन करते हैं। यह लेखन विविधता अनायास ही नहीं आया था बल्कि इसके पीछे भी दिनकर की मोकामा घाट की स्कूली शिक्षा एक कारण है। अंग्रेजों के जमाने में उस स्कूल में हिन्दी, उर्दू, बांग्ला और अंग्रेजी जैसी भाषाओं में न सिर्फ शिक्षा दी जाती थी बल्कि वैश्विक स्तर पर ब्रिटिश शासन के विस्तार के कारणों को भी उन्होंने अंग्रेजों की जुबानी जानी थी। वे जानते थे कि मोकामा के हाथीदह में कैसे मुगलों की सेना के हाथी गंगा में बह गए, वे जानते थे कि कैसे किसान पीड़ित हैं और शोषित होते हैं। ऐसी और भी कई बातें जिसे उन्होंने मोकामा में नजदीक से महसूस किया।

शस्त्र और शास्त्र के गुणों से भरपूर मानव ही प्रगतिपथ पर आरुढित हो सकता है और निर्भयता को प्राप्त कर सकता है। इसकी प्रेरणा वे परशुराम से ही लेते हैं। जाति कोई अभिमान का विषय नहीं है बल्कि यह स्वाभिमान का सूचक है। इसलिए दिनकर अक्सर चुटीले अंदाज में कहते थे- “ऐ मनु तेरा मनुहार हूं मैं ,सिमरिया घाट का भूमिहार हूं मैं। “लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं हुआ कि दिनकर को किसी एक जाति विशेष का गौरव माना जाए बल्कि वे तो सूर्य के समान थे। जैसे सूर्य का प्रकाश सबको आलोकित करता है और सबके लिए बराबर है वैसे ही दिनकर की कविताएं सबका प्रतिनिधित्व करती हैं। वे ‘रश्मि रथी’ में कर्ण के लिए कहते हैं –

दिल्ली में एक बार किसी साहित्यिक संगोष्ठी में दिनकर ने कहा था कि मेरा जन्म जिस सिमरिया में हुआ और मेरी शुरूआती शिक्षा जिस मोकामा घाट में हुई, वहां मैंने कई ऐसे सूरवीरों को देखा है जिनके ओज के आड़े जाति नहीं आई। बल्कि वे अपने पराक्रम के बलबूते सफल हुए।

हालांकि दिनकर को उग्र राष्ट्रीयता के पीछे अपने गौरवशाली अतीत का भान और मान था। संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने अतीत के इस गौरव को करीने और सलीके से सजाया है। इसी प्रकार दिनकर तो ‘उर्वशी’ में प्रेम, वासना और अध्यात्म का अद्भुत संगम हैं। यह पुरुरवा और उर्वशी की कहानी है जो महाभारत के शान्ति पर्व से उठाई गई थी। इसमें दिनकर ने मानव को देवदूत और ईश्वर से बहुत ऊपर रखा है। दिनकर कोरी बातें करने वालों में नहीं थे बल्कि वे मानव की उस सच्चाई को सहज शब्दों में बयां करने की कूबत रखते थे जिसे हम कहने से डरते हैं। इसलिए स्त्री और पुरुष के बीच नैसर्गिक आकर्षण को उर्वशी में दिनकर ने लिखा है –

ऐसे थे हमारे दिनकर जो हिमालय से अडिग, सूर्य से ऊर्जावान, समुद्र से शांत, धरती से सहनशील और वायु से वेगवान रहे। संयोग से पावन गंगा के दो तटों सिमरिया और मोकामा घाट में अपना बचपन और किशोरावस्था व्यतीत करने वाले रामधारी से दिनकर बने हमारे दिनकर का अवसान भारत के उस दक्षिणी समुद्र तटीय हिस्से मद्रास (अब चेन्नई) में 24 फरवरी 1974 को हुआ। जैसे गंगा हिमालय से उतरती है और समुद्र में अपना गंतव्य तलाश लेती है वैसे ही गंगा घाट के दिनकर भी गंगा से चले और मद्रास के समुद्र में अपना गंतव्य तलाश लिया।१९१० में स्थापित इसी स्कूल में पढ़े थे दिनकर
दिनकर के स्कूल के दिनों की उपस्थिति पंजी आज भी स्कूल में है इसी छात्रावास में रहते थे दिनकर