मोकामा
संपादकीय

राष्टकवि दिनकर भाषाई संगम के राजकुमार

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मिथिला के कंठ और अंगिका के चरण-चारण मे सम्माहित दिनकर जब ज्ञान अर्जन को मगध के हृदय मोकामा आये होंगे,तब भी हिंदी के हस्ताक्षर बच्चा बाबू के मोकामा ने उनके युक्ति एवं बौद्धिक प्रबलन मे कोई कमी नही रखा होगा । भौतिक ज्ञान के साथ साथ संघर्ष की इमारत प्रफुल चाकी के सहादत से सुगन्धित मोकामा ने दिनकर के जीवन संघर्ष के संदर्भ मे एक अलग ही अध्याय जोडा होगा । इसमे मे कतई अतिशयोक्ति नही की जब दो अलग-अलग संस्कृतिक प्रदेश के संगम स्थल से मोक्षदायनी गंगा के मध्य राष्ट्रकवि दिनकर नाम के अंतरराष्ट्रीय कवि का सृजन हुआ होगा तब ही जा कर दिनकर संस्कृति के राजकुमार कहलाये होंगे । मानिये तो ये मोकामा का लवणीय धरा ही होगा जिसने एक साधारण से मात्र छात्र को राष्ट्रकवि के ओहदा तक पहुँचाया हो…….एक सयोंग ही मानिए ठीक उसी प्रकार दशकों बाद अंगिका और मिथिला की अनूठा संगम से मै भी निकल कर मगध के हृदय मोकामा आया हूँ,और एक दशक तक यहाँ रह कर बहुत कुछ सिख रहा हूँ और बहुत कुछ सीखना है….इसमे कोई शक नही की मगध के लाज मोकामा की संस्कृति,स्मिता कल भी कालजायी थी और मेरे अनुषर्ण काल के बाद भी अमिट रहेगी..
(साभार:-मोनू सिंह गौतम )
आज मिथिला के लोग भाषा को लेकर लड़ रहे हैं। उस समय मुझे कुछ याद आया जो मैं बहुत पहले कहीं पढ़ा था। हाँ राज्यसभा टीवी पर एक प्रोग्राम में देखा था यह सब। शब्दसः तो नहीं किन्तु भाव अपने शब्दों में रख रहा हूँ। जोड़ने की ताकत होगी तो लोग आपकी बोली, आपकी भाषा सबसे जुड़ेंगे। लड़ना भी जरूरी है किंतु, बस लड़ने से ही भाषा को उसका इक्षित अधिकार नहीं मिलता है। कुछ साहसिक और ऐतिहासिक करना भी होता है उस भाषा को अमर करने के लिए।”सन 74 की बात है। रामधारी सिंह दिनकर तिरुपति में हैं।भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करने को। लोगों की भीड़ जुटी है , तिरुपति के हर जगह से लोग जुट रहे हैं। हर जगह माइक लगाई जा रही है।अहिन्दी क्षेत्र है और हिंदी के प्रति राजनैतिक घृणा जोरों पर है। कुछ हिंदी के दक्षिणी विद्वान जो कि दिनकर से अवगत हैं कि आज कुछ ओजस्वी कहेगें यह महान पुरूष।दिनकर धोती कुर्ता गमछा धारण कर तिरुपति के मंदिर के प्रांगण में पहुंच गए हैं। भगवान वेंकटेश्वर की स्तुति करने को उनका जी कर रहा है।

वे तत्काल बने मंच पर चढ़ते हैं। लोगों का विशाल जनसमूह जुटता है और हिंदी का आग ‘दिनकर’ #रश्मिरथी का सस्वर पाठ शुरू करते हैं। #रश्मिरथी के हर सर्ग को सुनकर लोग भावविह्वल हो गए हैं। कर्ण के प्रसंग को सुन लोग सिसक रहे हैं। दिनकर भगवान वेंकटेश्वर को बता रहें कि कुरु के रण में क्या क्या किये आप ? विष्णुवतार ।इस तरह से कविता पाठ होता है और कुछ ही देर या दिन बाद दिनकर की तबियत बिगड़ती है। उन्हें चेन्नई ले जाया जाता है। लड़ते, जुझते हुए वो महामानव इस धरा से उन्मुक्त हो लेते हैं।”भाषा में दम हो और भाव हो तो उसको सब भाव देते हैं। हिंदी ने आगे ऐसे महापुरुषों को पैदा कम किया तो आज उसकी भव्यता भी खो रही है बस सिनेमा या गाना या प्रचार में आने भर से भाषाई गहराई थोड़े साबित होता है।दिनकर जैसा कुछ करना पड़ता है। दिनकर बनिये ,उनसे बेहतर बनिये,उन जैसा बनने की कोशिश कीजिये तब देखियेगा भाषा भी आपकी श्रृंग पर विराजमान होगी।नमन दिनकर आपको आपकी पुण्यतिथि पर।
(साभार:-अविनाश )