मोकामा
संपादकीय

माँ तो बस माँ है,उसके लिए एक दिन नहीं पूरा जीवन समर्पित है

Spread the love

अभी कुछ दिन पहले मदर्स दे आया था.माँ को हजारों उपमाओं से शुशोभित किया गया. उसमे हमलोग भी थे.एक दिन के लिए माँ के साथ मिल बैठ कर केक काट लिया, कुछ अच्छा बना खा लिया.सेल्फी ले ली फेसबुक और सोशल मिडिया पर फोटो शेअर कर दिया.हो गया मदर्स डे.आये दिन माँ अपने बच्चो के प्यार से दो बात को तरसती रह जाती है ,रोटी के 2 टुकरे के लिए घंटो इन्तजार करती है .हम लोग अपने रोजमर्रा की जिन्दगी में इतने व्यस्त हो जाते है की चाहते हुए भी माँ के लिए कुछ वक्त तक नहीं निकल पाते है .कंही कंही माँ हमपर धीरे धीरे बोझ सी बन जाती है.एक दिन के लिए वो साल भर इन्तजार करती है की उके बच्चे उसे एक दिन ही सही प्यार तो करेंगे ,समय से खाना तो खिलाएंगे .

जरा सोचियेगा क्या माँ कभी सोचती थी आपके बारे में की आप को पैदा करने में उसे कितन कष्ट सहना पड़ा था.आपको खीने के लिए कितनी रात उसने खाना नहीं खाया था.क्या माँ कभी शियाकत करती भी थी .शायद नही क्योंकि माँ कभी न थकती है.पृथ्वी सी फिरती है.पोषण से भरती है.क्या कभी ठहरती है?फिर हम क्यों भूल जाते है माँ को.माँ को महज एक दिन के लिए वो भी सेल्फी के लिए याद करना कितना शर्मनाक . हमसब रोज सवेरे टहलने जातें हैं. हर रोज इनको अपनी बुजुर्ग माता जी जिनकी उम्र लगभग 95 साल है , को इसी तरह पकड़ कर मैदान में ला कर टहलाते हुए देखते हैं.हर रोज लगभग 2 किलोमीटर.ये पचमहला के वार्डपार्षद मोहन जी हैं. यह काम ये वर्षों से करते आ रहें हैं.सलाम है माता जी के जज्बा , हिम्मत , जीने की चाहत को. बंदन है उनके पुत्र को. सीख है फेसबुक पर मदर्स ढे पर लम्बी चौड़ी ढींगे हाकने वाले को.