मोकामा
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मोकामा!

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(मोकामा:-डॉ सच्चिदानन्द सिंह का लघु शोध  )

पटना जिला के पूर्वी छोर पर ३० की.  मी. लंबी राष्टीय उच्च पथ पर अवस्थित मोकामा हर दृष्टी से  जिला मुख्यालय बनने की पात्रता और क्षमता से संपन्न है. इसे ‘सी’ क्ष्रेणी का शहर का दर्जा वर्षों पहले मिला था.उस समय बेगुसराई,लखीसराय ,समस्तीपुर,शेखपुरा के लोग मोकामा में ही आकर अपने सामानों की खरीद बिक्री किया करते थे .इसकी भोगोलिक ,पौराणिक ,ऐतिहासिक ,आर्थिक ,ओधोगिक ,प्रशासनिक ,सामाजिक,सांस्कृतिक और राजनीतRSCN5608 - Copyक स्थिति ऐसी गरिमामई है जो पटना जिला के किसी अन्य नगर और प्रखंड को प्राप्त नहीं है.

पौराणिक काल में महर्षि विश्वामित्र एवं वशिष्ट के वैचारिक युद्ध के समय यह स्थान भगवान परशुराम का कार्य स्थल और तप साधना स्थल रहा है .यही से तपो साधना में लीन  भगवान परशुराम धनुष भंग के समय जनकपुर गए थे.

ईसाई धर्मबलम्बियों का बिहार का सबसे बड़ा चर्च मोकामा में ही है.फ़रवरी के प्रथम रविवार को यंहा ईसाईयों का एक बहुत बड़ा मेला लगता है .इस सम्बन्ध में मान्यता है की माँ मरियम यंहा देखि गई है. यह तीर्थाटन के रूप में प्रख्यात है .इस मेले की शोभा विदेशी शैलानी भी बढ़ाते है.

भारत का सबसे बड़ा हरिजन मेला ‘बाबा चौहरमल’ मोकामा स्थित चारा-डीह में प्रतिवर्ष  चैत मास के पूर्णमासी को लगता है .

मुस्लिम धर्मबलम्बियों का मजार हजरत तवारक हुसेन रह्म्त्तुल्ला अलेह ‘हजरत अज्गय पीर बाबा ‘ के नाम से मोकामा घटा के सी. आर.पी.एफ. केम्पस में है.यंहा खालिद के चाँद के तिथि ग्यारह एवं बारह के दिन विशाल मेला लगता है इस मेले में भारत के हर भाग से लाखों मुसलमान भाई चादर चढाने गाजे बजे के साथ आते है .उनका मानना है की पीर बाबा के दरगाह में मानगी गई हर दुआ कुबूल होती है.हिंदुओं की भी इस पीर के दरगाह में अथाह क्षर्धा है.

आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक के लगभग प्रतेक छोटे बड़े युद्ध के सैनिकों का पड़ाव या मुकाम स्थल रहने के कारन इसका नामकरण मुकामा पड़ा जो अंग्रेजों के शासन काल में  मुकामा से ‘मोकामा’ हो गया. वैसे १८६५ ई पूर्व मोकामा सलेमाबाद के रूप में जाना जाता था.बाढ़ अनुमंडल बनने के पहले मोकामा में ही छ: आना कचहरी था,जंहा जमीन जायदाद का निबंधन १८६५ से ही होता चला आ रहा था.आज भी पुराने लोगो के पास निबंधन कागज में इसे देखा जा सकता है.

सन १९४५ ई. मै अंग्रेजों की दूरदर्शिता ने मोकामा को पटना के समकक्ष का शहर बंनाने और इसका धीरे धीरे विकास की एक योजना बनाई थी .यह योजना आज भी बिहार के अभिलेखागार में पड़ी होगी. सन १९४५ का अंतिम महीना था.जेल से बीमारी की हालत में रिहा होकर डाक्टर राजेंद्र प्रसाद मोकामा आये थे.उनके स्वागत भाषान में मोकामा के प्रथम विधायक श्री जगदीश नारायण सिंह ने अंग्रेजो की इस योजना ‘मोकामा को जिला बनाने’ का डटकर विरोध किया था.१९४६ ई. से ही मोकामा में जिला नयायालय बैठने की बात थी जो उनके विरोध के कारन आजतक लाबित है.द्वितीय विश्वयुद्ध के समय और अगस्त क्रांति काल में गोरखा सैनिको और पलटन का यह मुख्य पडाव स्थल रहा .आज भी उतरी पूर्वी छोड़ के इस अंचल में सबसे बड़ी सी.आर.पी.एफ. ग्रुप केन्द्र मोकामा घाट में है.इस शहर का गौरव चिल्ड्रेन पार्क एवं शवदाह गृह मोकामा वार्ड न. २० स्थित चिंतामणि चक में है .मोकामा के दक्षिणी भाग में लगभग १२  की.मी. लंबी वायपास रोड है.मोकामा वार्ड न. १५ स्थित महादेव स्थान में बना गंगा घाट भी एक महवपूर्ण स्थान रखता है.वनारस के बाद दूसरा शहर जिसे यह गौरव प्राप्त है.

मोकामा प्रखंड का मोर ग्राम मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की गरिमा से जुदा स्थान है.इसी प्रखंड में स्थित हथिदह गावं में बंगाल से लौटते हुमायूँ की फ़ौज के हाथियों  का दल को गंगा की तीव्र धारा में बह जाने के कारन उसे हथिदह नाम से जाना जाता है .आज भी हथिदह में गणग नदी पर निर्मित राजेंद्र पुल सम्पूर्ण भारत में ख्यात है जो रेल और सड़क यातायात  के सक्षम साधन के रूप में अपना कोई प्रतिद्वंदी नहीं जनता है.

मोकामा पांच जिलों उत्तर के बेगुसराई,समस्तीपुर,दक्षिण के नालंदा,पूर्व के लखीसराय ,और पश्चिम के पटना जिले का मुख्य मिलन विन्दु है जो उतरी पूर्वी भारत को देश के दूसरे हिस्से तथा उत्तर बिहार की शस्यश्यामला भूमि वाले क्षेत्र को झारखण्ड के औधोगिक एवं खनिज संपदा वाले क्षेत्र से जोड़ता है.सड़क यातायात की दृष्टी से मोकामा येसा महवपूर्ण स्थान  शायद ही बिहार में कोई हो जंहा से सड़क पूर्व दिशा में कोलकत्ता ,पश्चिम दिशा में पटना-आरा-वाराणसी होती हुई दिल्ली की और,उत्तर में मुजफ्फर पुर ,दरभंगा,समस्तीपुर, की और ,दक्षिण में नालंदा होती हुई रांची,जशेदपुर की और उत्तर पूर्व दिशा में आसाम को जाती है.

मोकामा  पुरे बिहार ही नहीं अपितु सम्पूर्ण उत्तर भारत में कृषि का केंद्र रहा है.इस प्रखंड के दक्षिण में हजारों हेक्टेअर तथा मीलों के क्षेत्र में फैला मोकामा टाल क्षेत्र दलहन-तिलहन तथा रब्बी की मुख्य फसल का एक मात्र केंद्र रहा है,जिसकी क्षमता लाखों तन अन्न उत्पादन की रही है.इसलिए बिहार की ही नहीं,भारत सरकार की की नज़र मैं वर्षों पूर्व से मोकामा टाल योजना चर्चित है.दलहन का यह भंडार सम्पूर्ण देश को दाल खिलने की क्षमता रखता है .

औधोगिक दृष्टी कोण से मोकामा की महता किसी से छिपी हुई नहीं है.इसकी गुड मैं एशिया प्रसिद्ध बाटा कंपनी एवं मेक्डोवेल कंपनी,भारत वैगन कारखानातथा सुता मिल्स स्थित है .यह औधोगिक स्वरुप बिहार की राजधानी पटना को भी मय्यसर नहीं है.

उस समय दुनिया मैं दो ही फ्लोरिंग दाग बना था एक मोकामा घाट में और दूसरा इंग्लैंड के लीवर पूल मैं था.उत्तर भारत मैं चलने वाली पानी के जहाज यही पर बनते थे.मरम्मत कार्य तो आज से कुछ साल पहले तक होता रहा था जो यूनियन के नेताओं के चलते नीलम कर दिया गया .मोकामा घाट एशिया का सबसे बड़ा माल गोदाम एवं प्लेटफार्म था,यही से उत्तर भारत मैं हरेक सगरी का आयत निर्यात होता था जब बिहार मैं सिर्फ पटना और जमशेदपुर मैं बिजली जलती थी तो मोकाम घाट में  प्लेटफार्म पर और रेलवे कॉलोनी के लोग बिजली के प्रकाश मैं रहते थे.

यंहा का मोकामा ज. पूर्व रेलवे का मुख्य ज. है जो इस क्षेत्र मैं पटना के बाद येसा दूसरा रेलवे ज. है  .जिससे रेलवे को प्रति माह लगभग ८० लाख रूपये का राजस्व प्राप्त होता है. यह रेलवे ज. उतरी बिहार तथा उत्तरी पूर्वी भारत को देश के अन्य भागों से जोड़ने बाला ज. है .

मोकामा स्थित ऍफ़. सी. आई.  का गोदाम सपूर्ण देश के ताल पर विख्यात सर्वाधिक सुरक्षित गोदाम है.जन्हा लाखों टन खाधान भण्डारण के रूप मैं पड़ा रहता है.पूर्व काल मैं यंहा एशिया का सबसे बड़ा माल गोदाम मोकाम घाट मैं था.

मोकामा के नाजरथ अस्पताल की महता जगजाहिर है जन्हा एनी जिलों से सैकड़ो हजारो मरीज इलाज करवाने आते है.व्यवस्था और सफाई की दृष्टी से महवपूर्ण यह अस्पताल गौरव का पात्र है.सामाजिक और सरकारी उदासीनता के कारन यह अस्पताल विगत एक साल से बंद पड़ा है.

राजस्व की दृष्टी से मोकामा प्रखंड बाढ़,बख्तियारपुर,फतुहा आदि प्रखंडो से काफी जयादा है.

शिक्षा ,संस्कृति, साहित्य ,कला आदि दृष्टियों से भी यंहा की महत्ता जग जाहिर है.यह स्थान रास्त कवि दिनकर की माध्यमिक शिक्षा की भूमि रही है.प्रसिद्ध शिकारी और वन्य प्रेमी जिम कार्वेट की यह कर्म स्थली रही है,अमर शाहिद् प्रफुल्ला चन्द्र चाकी की शहादत भूमि रही है.तेन सिंह शेरपा प्रथम भारतीय पर्वतारोही जिन्होंने एवरेस्ट फतह किया की जन्म भूमि है.यंहा बहुत से स्वतंत्रता सेनानी हुए जिनके त्याग और बलिदान से बिहार परिचित है.यंहा राष्ट पिता महात्मा गाँधी,प्रथम रस्त्पति डा. राजेंद्र प्रसाद सिंह ,प्रथम प्रधान मंत्री प. जवाहर लाल नेहरु ,जय प्रकाश नारायण ,मोरार जी देसी,श्री मति इंदिरा गाँधी,राजीव गाँधी,विश्नाथ प्रताप सिंह ,चन्द्र शेखर ,अटल बिहारी वाजपई सहित कई रास्टीय नेता पधार चुके है.

मोकामा की गोद मैं उच्च शिक्षा के लिए ३ कॉलेज ,दर्जनों उच्च विद्यालय ,सैकड़ो मध्य विद्यालय है.फिर भी इतना महवपूर्ण स्थान प्राश्निक दृष्टी से प्रखंड स्टार की एक छोटी इकाई बना हुआ है.यह अपने दुर्भाग्य पर इसलिए रो रहा है कि अपने जिले और अनुमंडल मैं यह जिला मुख्यालय तथा अनुमंडल  मुख्यालय  से सबसे दूर और उपेक्षित है.यंहा से प्रशासन की अनुमंडलीय तथा जिला मुख्यालय काफी दूर है.इसलिए प्रशानिक वयवस्था की किरण यंहा सबसे देर पहुचती है.परिणामतः; यंहा की शांति और सुरक्षा की व्यवस्था बराबर खतरा कान्त स्थिति मैं बनी रहती है और प्रशासनिक सुविधा से वंचित यह क्षेत्र अगति,पराभव और कुंठा का शिकार रही है.

(डॉ सच्चिदानन्द सिंह का लघु शोध  )

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