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मातम नहीं जी मेवा मिठाई से जाना जाता है मोकामा

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डेयरी के कारोबार से जुड़े हैं नौरंगा-जलालपुर व रामपुर-डुमरा पंचायतों में सैकड़ों परिवार
मोकामा : मोकामा प्रखंड के पूर्वी इलाके में खोया(मावा)-पनीर का निर्माण कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हो रहा है. खासकर नौरंगा-जलालपुर अौर रामपुर-डुमरा पंचायतों में सैकड़ों परिवार की जीविका इससे चल रही है. यहां से डेयरी उत्पाद कोलकाता, धनबाद आदि बड़े शहरों में भेजे जाते हैं.

जमुई जिले के सैकड़ों व्यवसायी खोया, पनीर, घी आदि के कारोबार से जुड़े हैं.  वे यहां से दुग्ध उत्पादों को हाथों-हाथ खरीद कर महानगरों में आपूर्ति करते हैं. इससे खोया, पनीर आदि के उत्पादनकर्ता को बाजार की चिंता भी नहीं रहती.वहीं, टाल इलाके में जरूरत के मुताबिक दूध भी आसानी से उपलब्ध है, जिसको लेकर मिनी डेयरी उद्योग तेजी से फैल रहा है. ग्रामीणों ने बताया कि करीब 20 वर्ष पहले नौरंगा गांव में खोया-पनीर बनाने का कार्य छोटे स्तर पर शुरू हुआ था, लेकिन अब कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हो रहा है.लोग अपने घरों और दलानों में यह प्रोजक्ट स्थापित कर रहे हैं. फिलहाल खोया, पनीर उत्पादन के लिए परंपरागत तरीका भी अपनाया जा रहा है, लेकिन आधुनिक मशीन स्थापित करने के प्रयास में भी कई कारोबारी जुटे है.किसानों के लिए खोया-पनीर बनाने का  उद्योग वरदान साबित हो रहा है. उन्हें दूध की अच्छी कीमत मिल जाती है. जानकारों की मानें तो सहकारिता से डेयरी प्रोडक्ट बड़े उद्योग के रूप में विकसित हो सकता है.इससे लोगों के बीच रोजगार का अवसर भी बढ़ेंगे. सरकार कृषि आधारित उद्योग को बढ़ावा दे रही है.

डेयरी उद्योग स्थापित करने के लिए लोगों को अनुदान का लाभ भी मिल रहा है, लेकिन यहां के लोग व्यक्तिगत रूप से छोटे स्तर पर इस उद्योग से जुड़े हैं. यदि उद्योग का रजिस्ट्रेशन और समय–समय पर उत्पादों के क्वालिटी जांच से और ही बेहतर परिणाम निकलेंगे.इधर इस कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकारी अनुदान व बैंकों से कर्ज के लिए काफी भाग-दौड़ करना पड़ता है, जिसके कारण लोग महाजन से उधार लेकर इस कारोबार में पूंजी लगाते हैं. हालांकि, बाद में यह महंगा सौदा साबित हो जाता है. वहीं, मेहनत के बाद भी कम आमदनी होती है. यदि सरकार की नजरें इनायत हों तो इस कारोबार से इलाके की समृद्धि बढ़ेगी. वहीं, काम की तलाश में लोगों का पलायन भी रुकेगा.बढ़ावा देने के लिए दिया जा रहा नुदान.सरकार कृषि आधारित उद्योग स्थापित करने के लिए सराहनीय कदम उठा रही है. डेयरी प्रोडक्ट भी खेती और किसानों से जुड़ा है. इसे बढ़ावा देने के लिए जिले से अनुदान दिया जा रहा है.मोकामा के पूर्वी इलाके में दुग्ध उत्पादों के निर्माण का सालाना टर्नओवर पांच करोड़ रुपये है. इलाके में छोटे-बड़े दो दर्जन से अधिक दूध की भट्ठियां स्थापित हैं. इनमें एक भट्ठी में प्रतिदिन खोया, पनीर आदि निर्माण के लिए 800 से 1500 लीटर प्रतिदिन दूध की जरूरत होती है. वहीं, प्रतिदिन करीब दो सौ किलो खोया या पनीर का निर्माण होता है. इस उद्योग से परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हजारों लोग जुड़े हैं. दूध की बढ़ती खपत को लेकर पशुपालन व्यवसाय से लोग तेजी से जुड़ रहे हैं. उन्हें दूध की अच्छी कीमत मिल जाती है.डेयरी मालिक महेश साह, बबन साह ने बताया कि शादी-विवाह व त्योहारों के मौसम में खोया व पनीर की खपत काफी बढ़ जाती है, जिसको लेकर दूध का जुगाड़ करना मुश्किल हो जाता है.वे इलाके के किसानों को दुधारू पशुओं की संख्या बढ़ाने की सलाह दे रहे हैं. पनीर की खपत आसपास के जिलों में ही सर्वाधिक है, जिसको लेकर दूसरे राज्यों में मांग के बावजूद आपूर्ति नहीं हो पाती है. दूसरे राज्यों में सबसे ज्यादा खोया की आपूर्ति की जाती है. पहाड़ी इलाकों में दूध उत्पादों की मांग सबसे अधिक है. इलाके एक मिनी डेयरी में प्रतिदिन 25 से 38 हजार रुपये की आय-व्यय होती है.

(https://www.prabhatkhabar.com/news/patna/story/1114929.html)