मोकामा
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महाशिवरात्रि

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#महाशिवरात्रि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक मूल ” परमतत्व” है जिसे लोगों ने परब्रह्म के नाम से पुकारा है, परमेश्वर के नाम से संबोधित किया है। भारतीय तत्वदर्शियों के अनुसार–सृष्टि के आदि काल से वह मूल “परमतत्व” घनीभूत होकर दो भागों में विभक्त हो गया। जब संस्कृति का विकास हुआ तो लोगों ने उन दोनों भागों को “शिव” और “शक्ति”की संज्ञा दी। सृष्टि के विकास-क्रम में आगे चल कर शिव और शक्ति “पुरुषतत्व” और “स्त्रीतत्व” की संज्ञा में परिवर्तित हो गए।
बाद में वही दोनों तत्व “ब्रह्म-माया” “प्रकृति-पुरुष” और “परमेश्वर-परमेश्वरी” के रूप में परिकल्पित हो गए। पुरुषतत्व धनात्मक और स्त्रीतत्व ऋणात्मक है। दोनों एक दूसरे की ओर बराबर आकर्षित होते रहते हैं। जहाँ आकर्षण है वहाँ “काम” है। सृष्टि की दिशा में वह “आदि आकर्षण” “आदि काम” है। कामजन्य आकर्षण मिथुनात्मक है। इसीलिए कहा गया है कि सृष्टि के मूल में “मैथुन”है। दो विपरीत तत्वों के आपसी आकर्षण में जब “काम” का जन्म होता है तो उसकी परिणति “मैथुन” में होती है। मैथुन का परिणाम है–सृष्टि। यही विश्व वासना है और नारी विश्ववासना की प्रतिमूर्ति है।
सृष्टि के आदि काल में जब शिव (पुरुष) तत्व और शक्ति (स्त्री) तत्व एक दूसरे की ओर आकर्षित हो कर एक दूसरे की सत्ता में विलीन हुए तो उसके परिणामस्वरूप विश्व ब्रह्माण्ड में एक विराट सर्वव्यापक चेतना का आविर्भाव हुआ जिसे आगे चल कर “आदि शक्ति” या “परमशक्ति” के नाम से जाना गया। यह स्पष्ट है कि इस आदिशक्ति का आदि विकास मिथुनात्मक है। अनुकूल परिस्थिति में, शरीरिक, मानसिक और आत्मिक संप्रयोग में वही आदिशक्ति परिणत होती है। इसी परिणित आदिशक्ति के साक्षात स्वरूप के पूजन और अभिषेक का एक स्वरूप है ‘महाशिवरात्रि’। मानव की उत्पति आधार के मूल शिव और शक्ति के पूजन की रात्रि ‘महाशिवरात्रि’