मोकामा
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जिंदगी मोकामा घाट की

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जिम कॉर्बेट यह एक ऐसा नाम है जो भले फिरंगी थे लेकिन अपनी युवावस्था के कई साल मोकामा घाट में बिताये। यूँ तो भारत में जिम कॉर्बेट को एक ऐसे शख्स के रूप में जाना जाता है जो आदमी से ज्यादा जानवरों को जानते थे। उनकी भाषा-बोली समझते थे। कोई जानवर या पक्षी बोल रहा है तो क्या कह रहा है, चल रहा है तो क्या कह रहा है; वे सब समझते थे। वे नरभक्षी तेंदुए से आतंकित जंगल में खुले में एक पेड़ के नीचे सो जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इस पेड़ पर लंगूर हैं और जब तक लंगूर चुप रहेंगे, इसका अर्थ होगा कि तेंदुआ आसपास कहीं नहीं है। कभी वे जंगल में भैंसों के एक खुले बाड़े में भैंसों के बीच में ही सो जाते, कि अगर नरभक्षी आएगा तो भैंसे अपने-आप जगा देंगी।

यानी जिम कॉर्बेट तो वह इंसान थे जो जंगलों और जानवरों में अपना जीवन तलाशते थे। भारत में बिताये अपने दशकों के सफर को जिम कॉर्बेट ने किताब का शक्ल दिया है। ‘मेरा हिंदुस्तान’ नाम से यह किताब उपलब्ध है। अगर आप मोकामा के सौ साल पुराने किस्से, उस समय का सामाजिक रूप, मोकामा घाट की महत्ता आदि को जानना चाहते हैं तो मेरा हिंदुस्तान किताब पढ़िए। जिम कॉर्बेट लिखित इंग्लिश किताब माय इंडिया का यह अनुदित हिंदी संस्करण है।पढ़िए मोकामा घाट को जिम कॉर्बेट की जुबानी।


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