Spread the love

कभी-कभी सोंचता हूं
मुझे भी हक है क्या
कुछ बोलने का,
या फिर सोचने का?

मोकामा चौक और नुक्कड़ों पर
लोग बातें करते हैं
अपने पड़ोसियों के चूल्हों
और देश-विदेश की खबरों पर,
उनकी ओर जब देखता हूं, तो कहते हैं:
‘हीरो बा के बंगला’ पर तो
‘खुसुर-फुसुर तो होबे करतो’।

सोचता हूं,
मुझे भी हक है क्या,
कुछ बोलने का,
या फिर सोचने का?

रेलगाड़ियों में बैठे यात्रियों को
जब देखता हूं जोर-जोर से चिल्लाते,
जाति और समुदाय के मुद्दों पर बड़बड़ाते।
पूछता हूं, तो कहते हैं कि
हल्ला-गुल्ला होबे करतो।

फिर सोचता हूं
मुझे भी हक है क्या,
कुछ भी बोलने का, या फिर सोंचने का?

टीवी स्टूडियो में बैठे
गुरूजन, मुनिजन एवं विद्वान विचारकों को
जब निहारता हूं
अपने टाई और दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए,
धर्म-भाषा और देश-विदेश जैसे विषयों पर,
अपने विचारों को चिल्ला-चिल्ला कर बेचते हुए,
मुझे बहुत आश्चर्य होता है,
पर यहां भी एंकर चिल्ला कर बोलता है:
चिल्लम-चिल्ली होबे करतो।

सोचता हूं फिर,
सचमुच में मुझे हक है क्या,
कुछ बोलने का,
या कुछ भी सोंचने का?

फेसबुक, ट्वीटर और वाट्सअप
पर जब पाता हूं
संदेशों और विचारों के
बाहुल्य और उनके आदान-प्रदान,
देखता हूं उनपर उठनेवाली उंगलियां
एवं बजनेवाली लाइक्स, कमेंट और गालियों की तालियां,

तभी किसी के गुनगुनाने की आवाज सुनाई देती है:
सोशल मीडिया के दौर तो अब चलबे करतो।

सोंचता हूं एक बार फिर
अपने बोलने और सोंचने के हक़ के बारे में।

तब याद आता है मुझे
आसमान में उड़ रहे जहाजोंमें बैठे
यात्रियों की वो जगह
जो कि जमीन के कोलाहल से दूर, काफी दूर लगता है।
कोई बातचीत, कोई बहस नहीं,
दिखते हैं सब
शान्त और प्रसन्नचित्त।

लेकिन एयरहोस्टेस की उन मधुर ध्वनियों
और मैगज़ीन की बोलती एवं चलती हुई
उन प्रचार चित्रों के बीच से आवाज आती है:
मुंह पर ताला लगबे करतो।

अरुण जी

डी. पी.एस,भटिंडा

मुझे भी हक है क्या
Tagged on:         

Leave a Reply