निकम्मे जनप्रतिनिधियों ने ली एक और जान

निकम्मे जनप्रतिनिधियों ने ली एक और जान |मोकामा को राजनीती का मक्का कहा जाता है । भारत और बिहार के हर पार्टी के बड़े बड़े नेता इसी मिट्टी से जन्मे हैं। आज भारतीय लोकतंत्र के हर सदन में यहां के लोग प्रतिनितिधत्व कर रहे हैं। हर छोटी बड़ी राजनीतिक पार्टियों में यहां के लोग बड़े बड़े ओहदे पर विराजमान हैं। फिर चाहे वह 10 जनपथ हो, चाहे 6-A दीनदयाल मार्ग , 1 आने मार्ग हो या 11 बलवंत मेहता राय मार्ग। हर दल में अपनी धाक जमाने वाले मोकामा के नेता मौजूद हैं।दुर्भाग्य से लोकतंत्र का असली चेहरा आजकल बाहुबल और धनबल ही है , तो पूरे बिहार में जिनकी तूती बोलती है सब यहीं से हैं। मगर स्वघोषित बड़े बड़े सूरमा के होते हुए मोकामा स्वास्थ्य में इतना कैसे पिछड़ गया, इसका जवाब किसी सरकार, दद्दा, भैया, प्रवक्ता के पास नहीं है।इतना बड़ा अस्पताल , बिहार का गौरव नाजरथ अस्पताल बंद हो गया। सरकारी अस्पताल तो खुद बीमार है। मोकामा, घोसवरी , मरांची में सरकारी आस्पताल तो है मगर डॉक्टर नहीं , दवाई नहीं ,जाँच नहीं ,सफाई नहीं। अगर आप स्वस्थ है तो इन सरकारी अस्पतालों में चले जाइये यकीनन आप कोमा में चले जायेंगे, बीमार होकर लौटेंगे। चाहे वर्तमान के जनप्रतिनिधि हो या पूर्व जनप्रतिनिधि किसी ने भी मोकामा के स्वास्थ्य व्यवस्था पर कभी सोचा तक नहीं।

हाँ, अगर स्वास्थ मंत्री कभी आये हैं तो बस मीडिया में बाईट देने के लिए। भगत किस्म के चमचे जिनका नारा बुलंद करते हैं उनके मुँह से अपने नेता के सामने यह बोल नहीं निकलता कि ‘आएं जी हममे सब बीमार होके मर रहलिये हैं अ तोरा देखाय नै दे हो।’हर दिन मौत के साए में है जिन्दगी। सड़क पर इतनी दुर्घटना हो रही है। पिछले 5-10 सालों में कितने नौनिहालों ने अपनी जान गवाई है, कितनी माताएं बाँझ हुई है, कितनी मांगों का सिन्दूर उजरा , कितनी बहनें राखी पर रोती हैं। आज मोकामा में ऐसा एक भी टोला या मोहल्ला नहीं है जहाँ किसी ने स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी के वजह से जान न गवाई हो। मोकामा का हर मोहल्ला मातम पर मजबूर हुआ है। मोकामा के हर वार्ड हर पंचायत के लोग इस बिगड़ी स्वास्थ व्यवस्था के कारण अपनी जान गंवाने को मजबूर हैं। डर कर जीने को लाचार हैं, सिसकने और रोने के लिए बेबस है क्योंकि आप अपने जनप्रतिनिधियों के सामने मुँह नहीं खोल रहे हैं। आज न कल सबकी बारी आ सकती है जब तक जिन्दा हैं वोट दे लीजिये , रख लीजिये जिन्दा लोकतंत्र को। लेकिन सोचिये खुद मरकर कब तक निक्कमे लोगों के लिए नारे बुलन्द करेंगे आप?

अभी कल की ही बात है अपने विपिन दा की बेटी की शादी थी। पूरा गांव इनकी बेटी की शादी में शामिल था। पटना से बारात आई थी। अपनी औकाद से बढ़कर उन्होंने खर्चा किया ताकि गांव और उनकी इज्जत बनी रहे। सारी परम्पराएँ निभाई जा रही थी। महिलाएं ,बच्चे , रिश्तेदार हर कोई खुश था अचानक विपिन दा की तबीयत बिगड़ गई और इलाज के आभाव में उनकी मौत हो गई।जी हाँ बेटी का कन्यादान करने वाला पिता स्वास्थ्य सुविधा न होने के कारण मर गए। आज अगर मोकामा में स्वास्थ व्यवस्था ठीक रहता तो यकीनन आज विपिन दा जिन्दा होते। शहनाई वाले घर में मातम नहीं पसरा होता। गांव अपनी बेटी को विदा करते हुए रोता, मगर दुर्भाग्य पूरा गावं बेटी विदाई पर खुशी के आंसू बहाने के बदले विपिन दा को कंधा देते समय रो रहा था। बेटी के विवाह मंडप पर पिता की चिता सजी थी।यह घटना मोकामा के हाथीदह गांव में सोमवार की रात में हुई। विपिन सिंह की पुत्री डोली कुमारी की पटना से बरात आयी थी। बरातियों के दुरागमन के बाद मंडप पर शादी की रस्में पूरी हो रही थीं। इसी दौरान विपिन सिंह अचेत होकर गिर पड़े। आनन-फानन में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी। इधर, गांव के प्रबुद्ध लोगों ने हस्तक्षेप कर विवाह को संपन्न कराया। बाद में घटना की जानकारी मिलते ही शादी की खुशियां मातम में बदल गयीं। ग्रामीणों ने बताया कि विपिन सिंह अपनी इकलौती बेटी के विवाह को लेकर काफी खुश थे, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। दूसरी ओर, बड़े बेटे विकास की भी गुरुवार को बेगूसराय बरात जाने वाली थी। लेकिन अब गांव के लोग इस घटना से काफी मर्माहत हैं।

आपको क्या लगता है ये एक सामान्य मौत है , किसी सोची समझी साजिश का आभास नहीं होता आपको? पिछले एक दशक से लोग छोटी छोटी घटनाओ में जान गवा रहे हैं। दुर्घटना ,आत्महत्या ,अचानक से आया कोई दौरा, हर बार सिर्फ और सिर्फ मौत जबकि हर मौत को टाली जा सकती थी।हमारे जनप्रतिनिधि चाहे वो किसी भी सदन के हों , नेता चाहे किसी भी दल के हों इन्हें कोई शर्म नहीं है। सबकुछ लूट लिया आपका फिर भी चुपचाप हैं। कब तक सवाल नहीं करेंगे अपने सोये नेताओं से। अगर उनमें कुछ गैरत बची है तो कम से कम मिल-बांट कर मोकामा की स्वास्थ्य व्यवस्था तो सुधार दें।

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