मोकामा
कृषि

अन्नदाता आन्दोलन ,28-05-2018 किसान महाबन्दी

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देश के तीसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था। लेकिन आज किसानों की दशा हमारे देश में क्या है, ये सभी को पता है। कोई भी नवयुवा आज स्वेच्छा से किसान नहीं बनना चाहता। कारण स्पष्ट है, पिछले साल मई महीने में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी थी कि वर्ष 2013 के बाद से अब तक प्रत्येक वर्ष लगभग 12000 किसानों की आत्महत्या की रिपोर्ट दर्ज की गयी है। ध्यान रहे, 12000 किसान प्रति वर्ष आत्महत्या कर रहे हैं, ऐसा रिपोर्ट में है; वास्तव में ये आँकड़ा क्या होगा, इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। तो फिर बताइये कैसे हो ‘जय किसान।।।’

अब बात करते हैं किसानों के आन्दोलन की। अभी कुछ दिनों पहले ही हमने देखा था महाराष्ट्र के किसानों ने 180 किलोमीटर की पदयात्रा की थी अपनी बेबसी से सरकार को रू-बरू करवाने के लिए। खैर, हमें भी पता है कि न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार, किसानों की इस दशा से बेखबर है।ऐसा ही एक आन्दोलन टाल क्षेत्र के किसान करने वाले हैं। 28 मई को बड़हिया, मोकामा, बाढ़ समेत कई प्रखंड और अनुमंडल के किसान व्यापक बंद की घोषणा कर चुके हैं। जिसमें रेल, सड़क-यातायात के साथ-साथ, सरकारी और प्राइवेट दफ्तर भी बंद रहेंगे। उत्तर बिहार और नार्थ-ईस्ट को जोड़ने वाला, मोकामा का राजेंद्र-पुल भी उस दिन पूरी तरह से बंद रहेगा। आखिर ऐसी कौन-सी लाचारी आ गयी किसानों के सामने कि उन्हें इस तरह व्यापक बंद का सहारा लेना पड़ रहा है?इसके लिए आइये अब कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं। भारत, दुनिया में दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और सबसे बड़ा आयातक देश भी है। 2015 में मोजाम्बिक से दलहन खरीद जहाँ 100000 टन था उसे सरकार 2020-21 तक 200000 टन करने के लिए पहले ही करार कर चुकी है। इस वर्ष भारत में भी दलहन उत्पादन लगभग 2 करोड़ टन के आस-पास हुआ है। गौरतलब हो, टाल क्षेत्र में मुख्यतः दलहन ही उपजाया जाता है।

सरकार ने दलहन के लिए 2017-18 में किसानों के लिए समर्थन मूल्य तो 4250 रूपये प्रति क्विंटल तय तो कर दिया, लेकिन खरीदी हो नहीं रही। मजबूरन, किसानों को अपना उपजाया अनाज बेचने के लिए बाजार का मुँह ताकना पड़ रहा है; जहाँ उनकी फसलों का खरीद मूल्य सरकार के समर्थन मूल्य और खेती में लगे उनके लागत से भी बहुत कम है। अब जबकि हर साल लगातार यही स्थिति बनती जा रही है; किसान अपना लागत मूल्य भी नहीं कमा पा रहे हैं; ऐसे में किसानों के पास आत्महत्या के अलावा और दूसरा रास्ता रह नहीं जाता। अपनी इसी बेबसी को लेकर उन्होंने 28 मई को बंद का आह्वान किया है ताकि सरकार के कानों पर जूं रेंगे। हो सकता है कर्नाटक में फिर से कोई चुनावी उठापटक हो जाये, हो सकता है विराट कोहली और नरेन्द्र मोदी पुश-अप, पुश-अप खेलें। हो सकता है मीडिया, इन सबके साथ आई।पी।एल। के फिनाले में व्यस्त हो और इन किसानों के बारे में कहीं कुछ दिखाया भी नहीं जाए, लेकिन फिर भी इन्हें अपनी बात कहनी है, तो कहनी है और मैं उनके साथ हूँ और पूरा किसान महकमा इनके साथ है। अब देखना है आप इनका साथ देते हैं कि नहीं… (- विनायक शर्मा),