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‘मोकामा घाट ’ एक स्मृति

भारत की प्रमुख नदी गंगा के किनारे बसे विभिन्न शहर और कस्बों में देश के विभिन्न घाट हैं जो उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में ब्रिटिश काल से ही स्थित हैं और उस समय से ही इनका उपयोग व्यापार-व्यवसाय, मालढुलाई तथा यात्रियों के आवागमन के लिए किया जाता रहा है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जल परिवहन शुरु से ही एक बेहतरीन माध्यम रहा है और भारत के इन गंगा घाटों के साथ भी यह तथ्य जुड़ा हुआ है लेकिन दुर्भाग्य से सरकारी नीतियों और दिन प्रतिदिन नदियों के ऊपर बनते नए-नए पुलों के कारण इन घाटों की उपयोगिता कम हो गई।
घाटों की इस  कहानी में बिहार का ‘मोकामा घाट ’ लंबे अरसे तक गंगा के कुछ प्रमुख घाटों में से एक था। ब्रिटिश काल में आवागमन और व्यवसाय के लिए ईस्ट इंडिया ने वर्षों तक इसका प्रमुखता से इस्तेमाल किया जो आजादी के बाद कुछ वर्षों तक भी जारी रहा। इतिहास और लोगों का कहना है कि किसी समय यहां से प्रतिदिन हजारों टन कार्गो और यात्री इस छोर से सिमरिया घाट जाते थे। उस समय मोकामा घाट में एक रेलवे स्टेशन, एक बंदरगाह, कई जहाज, भंडारण के लिए विशाल गोदाम, बड़ी सी कॉलोनी (इसमें ज्यादातर वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी रहते थे) आदि थे,  जिसमें विभिन्न काम होते थे।
मोकामा घाट के पास में ही गंगा नदी पर वर्ष 1960 में राजेन्द्र पुल अस्तित्व में आया और वहीं से मोकामा घाट  इतिहास के पन्नों मे सिमटने लगा क्योंकी घाट की अमूमन सारी जरुरतें पुल से पूरी होने लगी। यहां के जहाज, स्टेशन, गोदाम आदि सब कुछ धीरे धीरे अनुपयोगी हो गए। मेरा जन्म (अंग्रेजी में लिखी गई इसके मूल प्रति के रचनाकार की) उसी वर्ष हुआ जिस वर्ष पुल का उद्घाटन हुआ था और मैं मोकामा घाट के उजरते हुए साम्राज्य का एक गवाह भी हूं कि किस प्रकार यहां कि ट्रेक से लेकर अन्य सभी संसाधनों धीरे धीरे मृतप्राय हो गए। मैंने देखा है कि मोकामा घाट के एक एक हिस्से को इतिहास में परिणित होते हुए लेकिन मेरे साथ जुड़ी हुई वहां की यादें, मिथकें  और कई अनकही कहानियां आज भी मेरे जेहन में ताजा हैं जिसके आसानी से मिटाया नहीं जा सकता है। इस भूमि के साथ में आजादी के योगदान के कई किस्सों से लेकर विभिन्न ऐतिहासिक पुरुषों की कहानियां भी जुड़ी हैं जिनमें जिम कार्बेट, रामधारी सिंह दिनकर, प्रफुल्ल चंद चाकी आदि प्रमुख हैं।
वर्षो तक मैंने इस जगह के बारे मे सोचा है। मेरे दिमाग में कई प्रश्न आते रहे, कैसे यह परिवहन का प्रमुख केन्द्र था? वे कौन लोग थे जो इसका प्रबंधन करते थे? यहां  काम करने वालों में से कई अंग्रेज अधिकारी भी थे, जिनका इस जगह से लंबा अनुभव रहा होगा। जैसे जिम कार्बेट, क्या उन्होंने यहां काम करने के अपने अनुभव का कहीं वर्णन किया है और क्या किसी अन्य ने भी यहां के अपने अनुभव को प्रकाशित करवाया है? इनकी खोज करते हुए मैंने  गूगल, जी बुक, सामाचार, चित्र, वीकिपीडिया आदि विभिन्न माध्यमों से अपनी कोशिश को अंजाम दिया। मेरे इन सभी प्रयासों का परिणाम सिफर ही रहा क्योंकि मोकामा घाट से संबंधित कोई भी सूचना वीकिपीडिया या किसी भी अन्य गूगल टूल्स, मानचित्र आदि पर मौजूद नहीं था। खोज की इस प्रक्रिया में मैंने अनुभव किया कि एक समय विभिन्न गतिविधियों का केन्द्र आज विलुप्त होने के कगार पर है।
यह एक कटु अनुभव था लेकिन उसके बाद मैंने विचार किया कि मैं मोकामा घाट की ऐतिहासिक जानकारी को विकिपिडिया पर लाउंगा और इसी उद्देश्य से मैंने 10 से ज्यादा पुस्तकों का अध्ययन कर जो शोध किया उसमें मुझे मोकामा घाट से संबंधित कुछ रोचक तथ्य मिले।
जिम कार्बेट, प्रसिद्ध प्रकृतिप्रेमी, लेखक और मशहूर शिकारी  जिम कार्बेट ने मोकामा घाट रेलवे स्टेशन पर वर्ष 1893 से 1913 के बीच ईंधन निरीक्षक, श्रम ठेकेदार और यानांतरण प्रबंधक के रूप में कार्य किया। मोकामा में कार्य करते हुए जिम कार्बेट अपने शिकार के शौक को पूरा करने  के लिए समय समय पर वे उत्तराखंड के जंगलों में जाया करते थे और वहां बाघों का शिकार करते थे। बाद के वर्षों में उन्होंने ब्रिटिश आर्मी में नौकरी कर ली और वे पहले विश्व युद्ध का हिस्सा बने। उन्होंने अफ्रीका के केनिया में सेवानिवृत होने के बाद अपनी सारी कहानियां और किताबों को लिखा जिसमें अपने जीवन के कई अनुभवों और विश्व के विभिन्न हिस्सों का जिक्र किया। जिसमें मोकामा घाट की यादें भी शामिल रहीं।
स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रफुल्लचंद चाकी का भी मोकामा घाट की भूमि से जीवन के क्षणों में अभिन्न रिश्ता जुड़ गया। प्रफुल्लचंद चाकी और खुदीराम बोस ने 30 अप्रेल 1908 को मुजफ्फरपुर में अंग्रेज अफसरों पर बम फेंका था जिसमें एक अंग्रेज महिला और उसकी बेटी का निधन हो गया था। इस घटना के बाद प्रफुल्लचंद चाकी और खुदीराम बोस को पकड़ने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने जोरदार मुहिम छेड़ दी। घटना के बाद अंग्रेजों से लोहा लेते हुए प्रफुल्लचंद चाकी मुजफ्फरपुर से भागकर मोकामा घाट आ गए और यहां उन्होंने कुछ दिन बिताया ही था कि अंग्रेज सरकार को उनके मोकामा घाट में रहने की जानकारी मिल गई। बाद में मोकामा में हुए मुठभेड़ में अंगेज से लोहा लेते हुए जब भारत माता का इस वीर सपूत प्रफुल्लचंद चाकी के पास गोलियां खत्म होने लगी तो उन्होंने अपने ही रिवाल्वर से खुद को गोली मार ली।
मोकामा घाट के पावन भूमि से जुड़ा एक अन्य मशहूर नाम रहा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का। दिनकर ने मोकामा घाट रेलवे हाई स्कूल में ही अपनी शुरुआती शिक्षा पाई थी।
मोकामा घाट रेलवे स्टेशन का जिक्र एक अन्य प्रसिद्ध बंगला लेखक मलाबिका चक्रवर्त्त्ी ने अपनी पुस्तक में किया है। उन्होंने मोकामा घाट रेलवे स्टेशन पर मई 1897 में यात्रियों की भीड़ का वर्णन किया है। पुस्तक में वर्ष 1896-97 में बंगाल में आए अकाल का विस्तार से वर्णन करते हुए उसके एक अंश में मोकामा घाट और उसके विभिन्न हिस्सों तथा तात्कालिक उपयोगिता का वर्णन आया है।
मोकामा घाट से संबंधित कई अन्य तथ्य भी हैं जिनके जवाब अधूरे हैं।You may visit the following to see the article that I have created on Mokama Ghat on Wikipedia:http://en.wikipedia.org/wiki/Mokama_Ghat

Source:-Arun jee

(http://www.storylane.com/stories/show/1103241398/mokama-ghat–a-discovery?it=10s4863)

लिंक का हिंदी अनुवाद ( टीम मोकामा ऑनलाइन )

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