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उड़ान

Mokama Online

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वह चिड़िया पेड़ की छोटे-से नीड़ की जिंदगी से ऊब चुकी थी। अब वह पूरे आकाश पर छा जाना चाहती थी। उसकी आंखों में ढेर सारे सपने थे। उसे सच करने का जुनून भी था। इसके लिए वह कुछ भी कर सकती थी। उसके पास जोश तो था, पर वह होश खो चुकी थी। वह जल्दबाजी में थी। उसकी व्यग्रता देखकर उसकी सहेली ने कहा- सपने देखना अच्छी बात है, पर सफलता मेहनत, धैर्य, लगन, परिश्रम सब कुछ चाहती है। चिड़िया ने कहा- अब समय बदल गया है… तुम देखती नहीं, हमसे कम योग्यता वाले पक्षी भी इतनी ऊंची उड़ान भरते हैं कि हमसे कितने आगे निकल जाते हैं। पता है कैसे… वो इसका शार्टकट ढूंढ़ निकालते हैं।
सखी ने कहा – इसे शार्टकट नहीं, समझौता कहते हैं।
चिड़ियां-नहीं, इसे व्यावहारिकता कहते हैं और जो इसे समझ जाता है, वो बहुत आगे जाता है। सब कुछ पा लेता है।
सखी- जिसे तुम व्यावहारिकता कहती हो और जिस सफलता की तुम कामना करती हो… वो तुम्हें खोखलेपन के सिवा कुछ नहीं देगा। तुम इतनी अकेली हो जाओगी कि अपना दामन भी हाथ नहीं आएगा। तुम्हें सफल ही होना है तो बहुत सारे रास्ते हैं।
चिड़िया- नहीं… मुझे जल्दी है…
सखी – लेकिन एक बार तुम अपने साथी से भी सलाह ले लेती… तुम दोनों ने तो पूरी जिंदगी साथ उड़ने का फैसला किया है।
चिड़िया- तुम भी कितनी नादान हो… अपने साथी से सलाह ले लूं…? इतना भी नहीं समझती कि वो नर है, मैं मादा हूं… वो कभी मेरी ऊंची उड़ान पसंद नहीं करेगा… मेरे पंख काट देगा… नहीं… मुझे जल्दी है, अब मैं इस नीलगगन को अपने पंखों से जल्दी से जल्दी ही छूऊंगी।
सखी- नासमझ हो तुम… क्या तुम नहीं जानती कि यह अंधा जुनून तुमसे इतना समझौता करेगा कि तुम एक दिन आकाश से धरती पर जा गिरोगी।
चिड़िया का जवाब था- क्या तुम्हे नहीं लगता कि तुम मेरी होने वाली सफलता से अभी से ही ईर्ष्या कर रही हो।
इस उत्तर के बाद तो कोई भी प्रश्न बेमतलब-सा था। सखी चुप हो गई। चिड़िया का साथी भी दूसरी डाल पर बैठा सब सुन रहा था। उसे लगा अगर वो समझाने की कोशिश करेगा, तो मानव जाति का स्त्री-पुरुष विवाद भी आपसी रिश्ते पर हावी हो जाएगा। वो चुप ही रहा। जानता था इस तरह की सफलता का मतलब क्या होता है। पर वह चाहकर भी बोल पाया, रोक पाया।
चिड़ियां उड़ चली। उसके पंख आज पहली बार इतने उन्मुक्त थे। आकाश को पार करने की चाह में समझौता होना शुरू हो गया… धीरे-धीरे वो अपना सर्वस्व खोने लगी। जब-जब समझौता करती, अपने अंदर से भी रिक्त होती जाती, पर अब तो उसके पास कोई साथी था और ही कोई अपना। उसे धीरे-धीरे महसूस होने लगा कि उसकी उड़ान भी किसी दूसरे के हाथों नियंत्रित है। अब उसका अपना कुछ भी नहीं था। उड़ान, सफलता। वह थक चुकी थी। पर वह एक चक्रव्यूह में फंस गई थी। कीमत अपनी लगाई, पर हाथ कुछ नहीं आया…उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था, तभी देखा, चिड़ियों का एक झुंड बड़ी तेजी से रहा था, उनकी आंखों में भी सपने थे, वही जल्दबाजी थी, जुनून था, हर तरह के समझौते करने के लिए तैयार…चिड़िया को पता था, यह झुंड भी उसका कहना नहीं सुनेगी। पर उसे कहना था- सफलता व्यग्रता और सतही समझ से नहीं मिलती। वह तो लगन, धैर्य, परिश्रम मांगती है।
कहानी
तुम भी कितनी नादान हो, अपने साथी से सलाह लूं? इतना भी नहीं समझती कि वो नर है, मेरे पंख काट देगा…
सिनीवाली शर्मा

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