सरस्वती पुत्र को भाव भीनी क्षर्धांजलि !

मोकामा प्रणाम ,

आज दिल तो बहुत दुखी है.खबर भी बहुत बुरी है .मगर इस्वर को जो मंजूर हो उसे कौन मिटा सकता है .ये सम्पादकीय लिखते हुए आँखें नम है.यूँ तो एक दिन सबको ही जाना है मगर जिनकी जरुरत धरा को होती है वो लोग कुछ जल्दी ही बुला लिए जाते है .मोकामा ऑनलाइन की और से इस सरस्वती पुत्र को भाव भीनी क्षर्धांजलि

रमेश नीलकमल:-हिंदी साहित्य को अपनी कृतियों से अमर बनाने वाले रेश नीलकमल जी अब हमारे बीच नहीं है .मोकामा की मिटटी मैं जन्मे इस लाल ने हिंदी की जो सेवा की थी इसके लिए इन्हें विद्यावाचस्पति, विद्यासागर तथा भारतभाषाभूषण की उपाधि तक मिली.

21 नवम्बर, 1937 को जनमे, पले-बढ़े बिहार, पटना, मोकामा के ‘रामपुर डुमरा’ गाँव में। पढ़े गाँव में, बड़हिया में, कोलकाता में बी.ए. तक। फिर पटना से बी.एल. एवं प्रयाग से साहित्य-विशारद।

नौकरी की पूर्व रेलवे के लेखा विभाग में। बहाल हुए लिपिक श्रेणी-2 पद पर 07.10.1958 को और सेवानिवृत्त हुए 30.11.1995 (अप.) को ‘कारखाना लेखा अधिकारी’ पद से।

मानदोपाधियाँ मिलीं विद्यावाचस्पति, विद्यासागर तथा भारतभाषाभूषण की।

प्रकाशित पुस्तकें : 10 काव्य, 4 कहानी, 5 समीक्षा, 2 रम्य-रचना, 3 शोध-लघुशोध, 1 भोजपुरी-विविधा तथा 1 बाल-साहित्य, कुल 26 पुस्तकें प्रकाशित।

संपादन : कुल 10 पुस्तकें संपादित। ‘शब्द-कारखाना’ तथा ‘वैश्यवसुधा’ (साहित्यिक पत्रिकाएँ) का संपादन।

पुरस्कृत-सम्मानित हुए मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, प्रेमचन्द पुरस्कार, सरहपा शिखर पुरस्कार, साहित्यसेवा पुरस्कार तथा विभिन्न नौ संस्थानों द्वारा सम्मान से। तीन दर्जन से अधिक ग्रंथों/पुस्तकों में सहलेखन। इनके ‘व्यक्ति और साहित्य’ पर सात पुस्तकें प्रकाशित। 175 पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन तथा ‘शब्द-कारखाना’ एवं ‘वैश्यवसुधा’ त्रैमासिकी का संपादन।

संपर्क : अक्षर विहार, अवन्तिका मार्ग, जमालपुर-811 214 (बिहार)

इनकी सुप्रसिद्ध रचना आप मोकमा ऑनलाइन पर भी पढ़ सकते है

१.चादर तानकर सो गया

2.लौट आओ पापा

3.बुरे वक्त की कविता

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निधन / रमेश नीलकमल

पिछले 60 वर्षों से साहित्य की अनवरत साधना करने वाले और बिहार के साहित्यकारों की एक समूची पीढ़ी का मार्गदर्शन करने वाले वयोवृद्ध कवि, कथाकार, आलोचक और संपादक 76 वर्षीय रमेश नीलकमल का निधन हिंदी साहित्य की एक बड़ी क्षति है। साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के वे पुरोधा माने जाते हैं। उनके संपादन में लघु पत्रिका ‘ शब्द कारखाना ‘ का तीन दशक लंबा सफ़र समकालीन साहित्य की एक बड़ी घटना है। विपरीत आर्थिक स्थितियों के बावजूद उनके समर्पित प्रयासों से यह पत्रिका साहित्यिक पत्रकारिता का मीलस्तंभ बनी। उन्होंने दर्ज़नों कृतियों की रचना की जिनमें प्रमुख हैं – एक अदद नंगी सड़क, आग और लाठी, बोल जमूरे, अपने ही खिलाफ़ ( कविता संकलन ), एक और महाभारत, नया घासीराम, अलग अलग देवता ( कथा संग्रह ), समय के हस्ताक्षर, गमलों में गुलाब, किताब के भीतर किताब, कहानियों का सच ( आलोचना ) आदि। मैं व्यक्तिगत तौर पर भी उनका ऋणी रहा हूं। मेरी कविताएं सबसे पहले उन्होंने छापी, मेरा पहला कविता संकलन ‘ कहीं बिल्कुल पास तुम्हारे ‘ उन्होंने प्रकाशित कराई और कविता का ‘ शब्द कारखाना ‘ द्वारा प्रायोजित ‘निराला सम्मान ‘ उन्होंने मुझे प्रदान की। साहित्य के इस एकांत साधक को हार्दिक श्रधांजलि !

Dhruv Gupta

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कवि, कथाकार, संपादक व प्रकाशक रमेश नीलकमल के असामयिक निधन पर एक संस्मरण !

कवि, कथाकार और ’शब्द कारखाना’ पत्रिका के सिद्ध संपादक रमेश नीलकमल के निधन से मर्माहत हूँ..। बिहार में समकालीन लेखन के प्रति उनके योगदान को भूलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कई कवि व कथाकारों पहचान दी। उनकी पत्रिका ’शब्द कारखाना’ के 27 वें अंक, जो जर्मन साहित्य पर केन्द्रित था का संयोजन करने का अवसर मुझे मिला था। ग्युंटर ग्रास पर मेरे एक आलेख की उन्होंने बेहद सराहना की थी, जब अगले वर्ष ग्रास को साहित्य का नावेल पुरस्कार मिला था..।

रमेश नीलकमल हिन्दी, अंग्रेजी, मगही व भोजपुरी में अपनी रचनात्मक्ता की छाप छोड़ चुके हैं। उनका जन्म- 21 नवम्बर 1937 को बिहार, पटना, मोकामा के ‘रामपुर डुमरा’ गाँव में हुआ था। उन्होंने कोलकाता में बी.ए.,  फिर पटना से बी.एल. एवं प्रयाग से साहित्य-विशारद की थी तथा सेवानिवृत्त ‘कारखाना लेखा अधिकारी’ पद से की। उनकी 10 काव्य कृति, 4 कहानी संग्रह, 5 समीक्षा, 2 रम्य-रचना, 3 शोध-लघुशोध, 1 भोजपुरी-विविधा तथा1 बाल-साहित्य,  लगभग 20 पुस्तकें प्रकाशित हुई तथा 10 से अधिक पुस्तकों का उन्होंने  संपादन भी किया था।  ‘शब्द-कारखाना’  के साथ ही ‘वैश्यवसुधा’ त्रैमासिकी का भी वे संपादन करते थे साथ ही प्रगतिशील सृजनशीलता के नये आयाम की तलाश भी वे ताउम्र करते रहे…।
उनकी बहुचर्चित कालजयी कृति ’आग और लाठी’ के लिए उन्हें 1985 में प्रतिष्ठित मैथिली शरण गुप्त राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी साहित्यिक कृतियों पर मगध विश्वविधालय, भागलपुर विवि. एवं गौहाटी विवि. आदि उच्च शिक्षण संस्थाओं में शोध व अध्ययन कार्य हो रहे हैं…।
उनकी सहजता व आत्मीयता की कई बानगी मेरे हृदय में कायम रहेगी..। मधेपुरा/ सहरसा   स्थित मेरे आवास पर उनका पदार्पण कई बार हुआ था, दिल्ली, हरिद्वार व ऋषिकेश का पर्यटन भी हमने साथ-साथ किया तथा 17 सितं. 2000 को दिल्ली में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी हम कई दिनों तक साथ रहे। जमालपुर/ मुंगेर में भी उनका सानिध्य मिला। लगभग  दस वर्ष पूर्व लाल किला के प्राचीर में पिता जी हरिशंकर श्रीवास्तव ’शलभ’ के साथ ली गई उनकी तस्वीर, उनकी स्मृति को समर्पित है..।
अरविन्द श्रीवास्तव,
कला कुटीर,
मधेपुरा (बिहार)
मोबाइल- 9431080862.
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डॉ रमेश चन्द्र नीलकमल के रचना संसार तथा उनसे अनेक बार व्यक्तिगत चर्चा पर आधारित उनकी कृतियों के नामों एवं विचारों को संजोती एक रचना ——–

आसान नहीं होता है  ,’कवियों पर कविता’ लिखना ,
जग में रह कबीर बन जाना ,कीचड़ में कमल सा खिल जाना ।

होता है कोई नीलकमल , कीचड़ में खिल जाता है
बिना देख-रेख माली के , निज पहचान कराता है ।

कलपुर्जों में जीवन बीता  ,’शब्द कारखाना ‘ निर्माण किया ,
साहित्य को रमेश प्रसाद ने , एक नया आयाम दिया ।

कभी पूछता ‘बोल जमूरे’ ,’आग और लाठी ‘ देखी है ,
कभी खडा ‘अपने ही खिलाफ’, ‘कवियों पर कविता’ लिखता है ।

‘गमलों  में गुलाब’ उगाता , ‘राग-मकरंद ‘गाता है ,
‘अलगअलग देवताओं ‘ पर , शब्दों के फूल चढ़ाता है ।

‘काला दैत्य और राजकुमारी ‘की,कथा कहानी कहता है ,
दलित चेतना का प्रतीक ,’नया घासी राम ‘ बताता है ।

‘एक और महाभारत ‘ को, भविष्य में देख रहा,
‘समय के हस्ताक्षर ‘ बन , पुस्तक में लिख देता है ।

मरने से पहले चाहता ,अपनी एक वसीयत लिखना ,
बिना काष्ठ शब्दों के साथ ,तिल -तिल  जलना चाहता है ।

जीऊं जब तक शब्दों के ,संग मर जाऊं तो शब्दों के संग ,
‘किताब के भीतर किताब’ सा ,आज सिमटना वह चाहता है ।

तुलसी- सुर सभी बन जाते ,नहीं कबीर कोई बनाता ,
कमल खिले हैं सारे जग में ,’नीलकमल ‘ कोई खिलता है ।
(डॉ अ कीर्तिवर्धन )

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साहित्य का यह कुशल चितेरा 76  वर्ष की आयु में दिनांक 25 मई 2013 को  हमारे बीच से प्रस्थान कर गया । हिंदी साहित्य जगत को 2 6 मौलिक कृतियों से समृद्ध करने वाले इस महान साहित्यकार की 1 6 सम्पादित पुस्तकें हैं । आप ” शब्द कारखाना” तथा “वैश्यवसुधा ” जैसी प्रमुख  पत्रिका के संपादक रहे हैं ।
आपके कार्य का मूल्यांकन कराती हुई 1 6 पुस्तकें हैं ,3 शोध प्रबंध भी आपके साहित्य की पड़ताल करते हुए आपके कार्य का समग्र मूल्यांकन करने में सफल रहे हैं ।
आपका जन्म 2 1 नवम्बर 1937 को बिहार के रामपुर डुमरा (पटना) में हुआ था। वर्तमान में आप जमालपुर (बिहार) में निवास करते थे । आपके परिवार में 3 पुत्र व 3 पुत्रिया  हैं ।
उनका श्राद्ध कर्म दिनांक 06 जून को जमालपुर (बिहार ) में किया जाएगा ।

इस दुःख की घडी में अपनी संवेदनाये व्यक्त करता हूँ ।

आपके जाने से यहाँ अँधेरा नहीं होगा ,
आपकी यादों के चिराग हर राह जलाएंगे ,
आपके अन्तश से खिले जो फूल साहित्यासागर में ,
उनकी खुशबू से सारे जग को मह्कायेंगे ।

डॉ अ कीर्तिवर्धन
अध्यक्ष
अखिल भारतीय साहित्य परिषद्
(मुज़फ्फरनगर ईकाई )

हेड सर (सीताराम बाबा)..

एक येसा वक्तित्व जिनका अनुशासन का पैमाना इतना शख्त था की  छात्र तो छात्र शिक्षक गन भी उनके सामने कांपते नज़र आते थे.राम कृष्ण रुद्रावती उच्च विद्यालय को अपने हाथों से संवारा.अपने जीवन के अंतिम दिनों तक भी वो स्कूल जाते रहे और अपने ज्ञान का एक एक बूँद अपने समाज को सुनहला बनाने मैं अर्पण कर दिया . पढ़ाने का जूनून कह लें या एक शिक्षक का गुण बाबा रिटायर्ड होने के बाद भी  सप्ताह मैं एक दो दिन स्कूल चले ही जाते और अंग्रेजी की क्लास लेने लगते. छात्र से लेकर शिक्षक तक सबको अनुशासन का पाठ पढ़ाते.

जीवन की आखिरी बेला मैं जब उनका शरीर बिकुल जबाब दे चूका था तब भी वो अपने घर पर अंग्रेजी की मुफ्त ट्यूशन देते थे.बिना किताब पढ़ाने की उनकी क्षमता बच्चों को उनसे जोड़े रखती थी. उनके हाथो की छड़ी जिनका उपयोग वो भली भांति जानते थे.बच्चो को पढ़ाने मैं कोई कोताही नहीं छोड़ते अगर जरुरत होती तो वो पिटते भी थे.अगर कोई बच्चा पढने आने से मना कर देता तो उसे घर से भी बुलवा लेते. हर शाम अपने मोह्हले मैं घूम घूम कर लोगो से सुख दुःख बतियाते रहते .क्या बच्चे क्या बड़े हर किसी को टोक कर उसका हाल चाल  पूछते .शिकायत भी करते मगर सुझाव भी जरुर बताते.हेड सर अपने बच्चो(छात्रों) के भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहे जब भी कोई मिलता उसकी पूरी जानकरी लेते  क्या कर रहे हो ,पढाई कैसी है,अगर कोई कमी दिखती तो तुरंत सलाह देते.बाबा ‘गुलमोहर’ नमक किताब से पढ़ते थे. कभी उदास भी रहे  तो हँसते हसाते रहे.दुखी थे बाबा जब उनके घर के आगे का स्कूल खंडहर मैं तब्दील होता जा रहा था.बाबा न सिर्फ एक अच्छे शिक्षक,समाजसेवी थे वरन इन्होने देश की आज़ादी की लड़ाई मैं भी अपना योगदान दिया था.बाबा देश की आजदी की खातिर जेल भी गए. अंग्रेजों की लाठिया भी खाई थी.

पान खाना और रेडियो सुनना बाबा को बहुत पसंद था.बाबा सुबह से ही रेडियो पर समाचार सुन्ने लगते थे .दिन भर में १०-२० पान खा ही लेते थे.हर घंटे का समाचार,हर भासा का समाचार सुनते थे.खेती की भी बहुत जानकारी थी अक्सर लोगो को नए नए तरीके बतलाते.प्रशासन को भी फसलों की लूट और आगजनी आदि मामलो पर ध्यान दिलाते .वैसे तो बाबा में बहुत गुण था मगर अंग्रेजी का ज्ञान उने कूट कूट कर भरा था और वो इसे जीवन पर्यंत बांटते रहे.

हेड सर आज हमारे बीच नहीं है पर उनकी कही बाते प्रेरणा बनके हम सबका उत्साह बढ़ाते रहेंगे.

क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी!

सन १८८८ में १० दिसम्बर के दिन जन्मे क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। प्रफुल्ल का जन्म उत्तरी बंगाल के जिला बोगरा के बिहारी गाँव (अब बांग्लादेश में स्थित) में हुआ था। जब प्रफुल्ल दो वर्ष के थे तभी उनके पिता जी का निधन हो गया। उनकी माता ने अत्यंत कठिनाई से प्रफुल्ल का पालन पोषण किया। विद्यार्थी जीवन में ही प्रफुल्ल का परिचय स्वामी महेश्वरानंद द्वारा स्थापित गुप्त क्रांतिकारी संगठन से हुआ और उनके अन्दर देश को स्वतंत्र कराने की भावना बलवती हो गई। इतिहासकार भास्कर मजुमदार के अनुसार प्रफुल्ल चाकी राष्ट्रवादियों के दमन के लिए बंगाल सरकार के कार्लाइस सर्कुलर के विरोध में चलाए गए छात्र आंदोलन की उपज थे।

पूर्वी बंगाल में छात्र आंदोलन में प्रफुल्ल चाकी के योगदान को देखते हुए क्रांतिकारी बारीद्र घोष उन्हें कोलकाता ले आए जहाँ उनका सम्पर्क क्रांतिकारियों की युगांतर पार्टी से हुआ। उन दिनों सर एंड्रयू फ्रेजर बंगाल का राज्यपाल था जिसने लार्ड कर्जन की बंग-भंग योजना को क्रियान्वित करने में भरपूर उत्साह दिखाया था। फलत: क्रांतिकारियों ने इस अंग्रेज को मार देने का निश्चय किया। अरविन्द के आदेश से समिति के यतीन्द्रनाथ बसु, प्रफुल्ल चाकी के साथ दार्जिलिंग गए, क्योंकि वह राज्यपाल वहीं था परन्तु वहां जाकर देखा गया कि राज्यपाल की रक्षार्थ सख्त पहरा है और कोई उसके पास तक पहुंच नहीं सकता। अतः ये लोग लौट आए और यह योजना सफल नहीं हुई। उसे मारने का दूसरा प्रयास सन् 1907 के अक्तूबर में भी हुआ, जब उसकी रेल को बम से उड़ाने गए अरविन्द घोष के भाई बारीन्द्र घोष, उल्लासकर दत्त, प्रफुल्ल चाकी और विभूति सरकार ने चन्दननगर और मानकुंड रेलवे मार्ग के बीच एक गड्ढा खोदकर उसमें बम रखा, परन्तु वह उस रेल मार्ग से गया ही नहीं। आगे उसी साल 6 दिसम्बर को भी बारीन्द्र घोष, प्रफुल्ल चाकी और दूसरे कई साथियों को लेकर खड्गपुर गए और नारायण गढ़ जाने वाले मार्ग से एक मील दूर खड्गपुर के रेल मार्ग पर एक सुरंग रात के 11-12 बजे के बीच लगायी किन्तु रेल के क्षतिग्रस्त होने पर भी वह राज्यपाल बच गया। 7 नवम्बर, 1908 को भी इसी एंड्रयू फ्रेजर को कलकत्ते के ओवरटून हाल के एक बड़े जलसे में क्रांतिकारी जितेन्द्र नाथ राय ने पिस्तौल से गोली मारने की चेष्टा की, पर 3 बार घोड़ा दबाने पर भी गोली न चलने से वह पकड़े गए और उन्हें 10 वर्ष की सजा मिली।

क्रांतिकारियों को अपमानित करने और उन्हें दण्ड देने के लिए कुख्यात कोलकाता के चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को जब क्रांतिकारियों ने जान से मार डालने का निर्णय लिया तो यह कार्य प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को सौंपा गया। दोनों क्रांतिकारी इस उद्देश्य से मुजफ्फरपुर पहुंचे जहाँ ब्रिटिश सरकार ने किंग्सफोर्ड के प्रति जनता के आक्रोश को भाँप कर उसकी सरक्षा की दृष्टि से उसे सेशन जज बनाकर भेज दिया था। खुदीराम मुजफ्फरपुर आकर महाता वार्ड स्टेट की धर्मशाला में दुर्गादास सेन के नाम से और प्रफुल्ल चाकी दिनेशचंद्र राय के छद्म नाम से ठहरे। दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन किया एवं ३० अप्रैल १९०८ ई० को किंग्सफोर्ड पर उस समय बम फेंक दिया जब वह बग्घी पर सवार होकर यूरोपियन क्लब से बाहर निकल रहा था। पर दुर्भाग्य से उस बग्घी में मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी क्लब से घर की तरफ़ आ रहे थे। उनकी बग्घी का लाल रंग था और वह बिल्कुल किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने उसे किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी समझकर ही उस पर बम फेंक दिया था। देखते ही देखते बग्घी के परखचे उड़ गए और उसमें सवार मां बेटी दोनों की मौत हो गई। दोनों क्रांतिकारी इस विश्वास से भाग निकले कि किंग्सफ़ोर्ड को मारने में वे सफल हो गए हैं।

जब प्रफुल्ल और खुदीराम को ये बात पता चली कि किंग्स्फोर्ड बच गया और उसकी जगह गलती से दो महिलाएं मारी गई तो वो दोनों दुखी और निराश हुए और दोनों ने अलग अलग भागने का विचार किया। खुदीराम बोस तो मुज्जफरपुर में पकडे गए और उन्हें इसी मामले में 11 अगस्त 1908 को फांसी हो गयी। उधर प्रफुल्ल चाकी जब रेलगाडी से भाग रहे थे तो समस्तीपुर में एक पुलिस वाले को उन पर शक हो गया और उसने इसकी सूचना आगे दे दी। जब इसका अहसास प्रफुल्ल को हुआ तो वो मोकामा रेलवे स्टेशन पर उतर गए पर तब तक पुलिस ने पूरे मोकामा स्टेशन को घेर लिया था।

१ मई १९०८ की सुबह मोकामा में रेलवे की एक पुलिया पर दोनों और से दना दन गोलियाँ चल रही थी। जो लोग उस समय वहां रेलवे स्टेशन पर अपनी अपनी गाड़ियों का इन्तजार कर रहे थे, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था और जिसको जहाँ जगह मिली वहीँ छुप गया। लगभग २.३० घंटा गोलियों की गूंज से गुंजायमान रहा वो रेलवे स्टेशन और एक बहादुर जाबांज २.३० घंटे तक अपनी छोटी सी रिवाल्वर से लड़ता रहा अंग्रेजों से। अपने आप को चारों और से घिरा जानकर भी उसने न तो अपने कदम पीछे खींचे और न ही आत्मसमर्पण किया। अपने बहादुरी के दम पर उसने लगभग ६ अंग्रेज पुलिस वाले को घायल कर दिया। वो लड़ता रहा आखिरी दम तक पर जब उसने देखा कि अब आखिरी गोली बची है और अंग्रेज अभी भी चारों और से गोलियाँ चला रहे हैं तो उस तरुण ने माँ भारती को नमन किया। अपने आप को भारत माँ के चरणों में कुर्बान करने की कसम तो वो पहले ही ले चुका था पर उसकी आँखों से बहते आंसू ये बयान कर रहे थे कि वो जो अपनी धरती माँ के लिए करना चाहता थे, वो अधूरा रह गया। पर उसका वो संकल्प कि जीते जी कभी भी किसी अंग्रेज के हाथों नहीं आएगा, पूरा होने जा रहा था। उसने अपनी आखिरी गोली को चूमा, वहां की धरती का आलिंगन किया और उस गोली से अपने ही सर को निशाना बना के रिवाल्वर चला दी। अंग्रेज भी हक्के बक्के रह गए और वहां मौजूद लोगों के मुंह खुले के खुले रह गए। जब गोलियों की आवाज़ आनी बंद हुई तो लोगों ने देखा कि पुलिया के उत्तर भाग में एक २०-२१ साल का लड़का लहूलुहान गिरा पड़ा है और अंग्रेज पुलिस उसे चारों और से घेरे हुए है। कोई कुछ समझ पता उससे पहले ही अंग्रेज ने उस लड़के की लाश को अपने कब्जे में लेकर चलते बने। आज़ादी का ये दीवाना कोई और नहीं, प्रफुल्ल चंद चाकी ही थे|

आज़ादी का ये वीर सपूत अपने बलिदान से मोकामा की धरती को भी अमर बना गया। अपने माँ –बाप की एकमात्र संतान होने के बाबजूद चाकी ने देश की खातिर अपने को कुर्बान कर दिया। बिहार के मोकामा स्टेशन के पास प्रफुल्ल चाकी की मौत के बाद पुलिस उपनिरीक्षक एनएन बनर्जी ने चाकी का सिर काट कर उसे सबूत के तौर पर मुजफ्फरपुर की अदालत में पेश किया। यह अंग्रेज शासन की जघन्यतम घटनाओं में शामिल है। चाकी का बलिदान जाने कितने ही युवकों का प्रेरणाश्रोत बना और उसी राह पर चलकर अनगिनत युवाओं ने मातृभूमि की बलिवेदी पर खुद को होम कर दिया| मगर अन्य क्रांतिकारियों की ही भांति आज़ादी के इस दीवाने का जितना तिरस्कार हो रहा है, वो असहनीय है। हाँ, सन २०१० में चाकी के जन्म दिवस पर भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट अवश्य जारी किया था पर इसके अतिरिक्त उनकी स्मृति को अक्षुण बनाये रखने के लिए कुछ नहीं किया गया। किसी ने सच की कहा है—–
उनकी तुर्बत पर नहीं हैं एक भी दीया, जिनके लहू से रोशन हैं चिरागे वतन ,
जगमगा रही हैं कब्रे उनकी बेचा करते थे जो शहीदों के कफ़न !!

महान हुतात्मा को आज उनके बलिदान दिवस पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

Mukesh Kumar Verma