किस्मत वालों को मिलती है शहादत : वाइस एडमिरल!

मां ने कहा, बेटा देश के काम आया रणवीर की शहादत से प्रेरणा लें : नीरज प्रतिमा का अनवरण

मोकामा (एसएनएबी)। मातृभूमि की सेवा करने का मौका तो कई सपूतों को मिलता है पर कर्त्तव्य के दौरान वीरगति को प्राप्त बहुत कम लोग होते हैं क्योंकि मातृभूमि किस्मत वालों को ही शहीद कहलाने का मौका देती है। ये बातें वाइस एडमिरल दिनेश प्रभाकर ने लेफ्टिनेंट कमांडर शहीद रणवीर रंजन के प्रतिमा अनावरण समारोह को संबोधित करते हुए कहीं। विधान पाषर्द नीरज कुमार ने कहा कि महज 30 साल की उम्र में रणवीर ने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया। रक्षा अनुसंधान विकास संगठन के मुख्य कार्यकारी अजय सिंह और डीआरडीओ के मुख्य अभियंता विजीत चौबे ने कहा कि रणवीर रंजन ने कर्त्तव्य के दौरान अपने प्राणों की आहुति देकर इलाके का मान बढ़ाया है। आज वे उस मिट्टी और मां को नमन करने आये हैं जिसकी गोद में खेलकर रणवीर बड़ा हुए। अनावरण समारोह की अध्यक्षता शहीद के पिता राजनीति सिंह ने की तथा संचालन आयुध निर्माण, नालंदा के गजेन्द्र सिंह ने किया। जिला परिषद् सदस्य मुकेश कुमार ने कहा कि रामपुर डुमरा की मिट्टी आज धन्य हो गई। इससे पहले शहीद स्मारक का उद्घाटन शहीद की मां किरण राज ने फीता काटकर किया तथा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्रतिमा का अनावरण वाइस एडमिरल दिनेश प्रभाकर ने किया। इस मौके पर शहीद की पत्नी लेफ्टिनेंट कमांडर कुमकुम उनियाल, डीआरडीओ के सहायक मुख्य अभियंता भूपेन्द्र किशोर सिंह, डीआरडीओ के प्रोजेक्ट मैनेजर ब्रजेश कुमार, डीआरडीओ के विजय अलबेला, पूर्व सांसद सूरजभान सिंह, सूर्यनारायण सिंह, मुखिया संजय कुमार, जद (यू) नेता पवन कुमार, लोजपा नेता ललन सिंह, दीपक सिंह मरांची, निरंजन सिंह, नरसिंह सिंह सहितअन्य मौजूद लोग थे। स्मृति : लेफ्टिनेंट कमांडर रणवीर रंजन की याद में बने शहीद स्मारक के पास जमा लोग।

(Rastiy Sahara 27-12-12)

मां के भावुक अल्फाज और छलक गये आंसू!

मोकामा (एसएनएबी)। शहीद रणवीर रंजन के प्रतिमा अनावरण समारोह को संबोधित करने आयीं रणवीर की मां के शब्दों से पूरा माहौल भावुक हो गया। शहीद की मां किरण राज के संबोधन के दौरान कई लोगों के आंसू छलक गए। किरण ने कहा कि सोनू मेरा बेटा था और रणवीर रंजन भारत मां का बेटा था। बेटा आज साथ नहीं है जिसका दु:ख जीवन भर रहेगा पर संतोष इस बात का है कि बेटा वतन के काम आया। शहीद की मां के इस सार्वजनिक उद्बोधन से पूरा सभास्थल गमगीन हो गया और कई लोगों की आंखों से आंसू छलक पड़े। शहीद की लेफ्टिनेंट कमांडर पत्नी कुमकुम उनियाल ने पूरे समारोह में अपने को अंदर छिपाकर रखा। कुमकुम उनियाल के लिए निश्चित तौर पर यह दु:खद विडंबना थी कि शादी के अगले साल ही उनके पति शहीद हो गए और शहादत के दूसरे साल उन्हें अपने शहीद पति के स्मारक पर श्रद्धासुमन अर्पित करना पड़ा।

(Rastiy sahara 27-12-12)

शहादत को मिला सम्मान, प्रतिमा का अनावरण आज!

भारतीय नौसेना के शहीद लेफ्टीनेंट कमांडर रणवीर रंजन की याद में शहीद द्वार का निर्माण

मोकामा (एसएनबी)। भारतीय नौसेना के वीर सपूत लेफ्टीनेंट कमांडर रणवीर रंजन की शहादत का सम्मान करते हुए भारतीय नौसेना द्वारा उनके पैतृक गांव में शहीद द्वार का निर्माण कर उनकी प्रतिमा लगाई गई है जिसका अनावरण आज किया जाएगा। मोकामा के रामपुर डुमरा निवासी राजनीति सिंह और किरण देवी के पुत्र रणवीर रंजन वर्ष 2005 में भारतीय नौसेना में शामिल हुए थे। 21 जनवरी 1981 को पैदा हुए रणवीर बतौर लेफ्टीनेंट कमांडर भारत मां की सेवा कर रहे थे। अपने बेदाग कार्यकाल के दौरान 18 मई 2011 को लेफ्टीनेंट रणवीर रंजन विशाखापत्तनम में शहीद हो गए। बताते चलें कि शहीद रणवीर रंजन की शादी 2010 में ही देहरादून की कुमकुम से हुई थी। कुमकुम भी भारतीय नौसेना में लेफ्टीनेंट कमांडर हैं तथा फिलहाल विशाखापत्तनम में ही पदस्थापित हैं। माता-पिता अपनी लेफ्टीनेंट कमांडर बहू कुमकुम में ही रणवीर का अक्स देखते हैं। बेटे को खोने के सदमे से रणवीर के मां-पिता अब धीरे-धीरे उबर रहे हैं।शहीद बेटे की याद में बना स्मारक उन्हें रुलाता है, बेटे की याद दिलाता है पर आंखों में नमी के बावजूद स्मारक में जुड़ी हर ईट परिजनों को गर्व का अनुभूति कराती है। सलाम : रणवीर रंजन की याद में बना शहीद द्वार व (इनसेट ) रणवीर रंजन।

(Rastiy Sahara 26-12-12)

स्कूल बाबू राम लखन सिंह ‘क़ानूनी’!

न कभी कानून की पढाई की न ही कभी वकालत की और न ही कभी न्यायलय गए.मगर उस जमाने में जब जयादातर झगडे ,मामले पंचो के द्वारा ही सुलझाए जाते थे,आपका बड़ा ही नाम था, आपकी निष्पक्षता, न्यायप्रियता और साथ में आपकी कठोरता के कारन ही लोग आपको अपना पंच बनाते थे ,आपकी पंचायती से लोग संतुस्ट हो जाते थे.आपके  90 साल के जीवन काल में येसा कोई भी मामला नहीं आया जिसमे कोई पक्ष आपके दिए फैसले से असंतुष्ट रहा हो .सबकी बात आप सुनते थे  सारी पहलुओं पर ध्यान रख कर ही आप अपने फैसले देते थे. शायद यही कारन रहा होगा लोगो ने आपको “क़ानूनी “ की  उपाधि दी .और प्यार से लोग आपको “कानुंची लखन “ कहने लगे. आपकी न्यायप्रियता और निष्पक्षता के कारन ही सिर्फ मोकामा के लोग ही नहीं मोकामा के आस पास बसे गाऊं के लोग भी आपसे पंचायती करवाते थे,गोसाई गाऊं,घोसवरी,सम्यागढ़,चिंतामन चक,सिखारी  चक,आदि गाऊं में  आपने बहुत सारे पंचायती किये .

३०-४० के दशक में जब शिक्षा को लोग समय और धन की बर्बादी मानते थे .आपने अपने समाज को शिक्षा पाने के लिए प्रेरित किया .छोटे बड़े सबको पढ़ने के लिए कहा करते थे.आपने कभी किसी स्कूल ,महा विद्यालय में कभी भी अप्ध्यापक या प्रोफ़ेसर के रूप में काम नहीं किया .मगर जब भी मौका मिलता था आप अपने ज्ञान से सबको शिक्षा देते रहे, राम रतन सिंह महा विद्यालय की रूप रेखा में आपका विषेस समर्पण ,या शुरुआती दौर में खुद वर्ग में जाकर छात्रों को पढाना ,महिलाओ और लड़कियों के लिए शिक्षा की पैरवी आप उस समय किया करते थे जिसके कारन बहुत सी महिलाओं ने शिक्षा ग्रहण की. और समाज  ने फिर आपको एक नया नाम  दिया . स्कूल बाबू जो बाद में “इस्कूल बाबू” हो गया .किसानो को भी खेती के साथ साथ पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे,खुद भी एक किसान रहे ,खेती में नित नए प्रयोग करते रहे .आपका बाग (गाछी) उस समय की सबसे सुन्दर और फलदार  था,आपके बाग में फलदार पेड़ जैसे आम, अमरूद,कटहल,निम्बू,महुआ जैसे परम्परागत पेड़ तों थे ही साथ सौफ,मूंगफली,चीकू,सरीफा आदि जैसे भी खेती होती थी.दूर दूर से लोग आपके गाछी को देखने आते थे और आप उन्हें हमेशा कोई न कोई पेड़ पौधा देते थे साथ साथ  खेती की उन्नति के उपाय बताते रहे.

आपका जन्म सकरवार टोला मोकामा में बाबू राम बखत सिंह के घर हुआ,सादा  जीवन उच्च विचार के सिद्धांत पर अपने जीवन के अंत तक कायम  रहे .18 दिसंबर  1997 को 94 साल की आयु में  आपने अपना देह त्याग किया .

सर्दियों के दिन थे .गंगा मैया बिलकुल सुखी हुई थी .आपके प्रताप को देखते हुए लोग आपको सिमरिया ,बनारस, या गया जी ले जाने की सलाह दे रहे थे,मगर आपकी इच्छा थी की आपका संस्कार  कौवा कोल(भुत नाथ ) में ही हो.सब लोग परेशान थे की गंगा में में तों ठेहुना(घुटना) भर पानी भी नहीं है.तों अंतिम संस्कार कैसे होगा.मगर आपकी अंतिम इच्छा पूरी करने हेतु लोग आपको वंहा ले गए .मगर देखते देखते वंहा गंगा भर गई.जैसे सावन भादो (बरसात) का महीना हो.मानो स्वयं गंगा आपको लेने आई हो.लोग तों पहले से ही आपके जाने के गम में बिचलित थे.मगर जब ये वाक्या हुआ तों लोगों की आख पुन्ह भर आई.

इस्कूल बाबू  आपकी 15 वि पुन्य तिथि पर मोकामा ऑनलाइन की तरफ से भाव भीनी श्रधांजलि

स्कूल बाबू राम लखन सिंह ‘क़ानूनी

न कभी कानून की पढाई की न ही कभी वकालत की और न ही कभी न्यायलय गए.मगर उस जमाने में जब जयादातर झगडे ,मामले पंचो के द्वारा ही सुलझाए जाते थे,आपका बड़ा ही नाम था, आपकी निष्पक्षता, न्यायप्रियता और साथ में आपकी कठोरता के कारन ही लोग आपको अपना पंच बनाते थे ,आपकी पंचायती से लोग संतुस्ट हो जाते थे.आपके  90 साल के जीवन काल में येसा कोई भी मामला नहीं आया जिसमे कोई पक्ष आपके दिए फैसले से असंतुष्ट रहा हो .सबकी बात आप सुनते थे  सारी पहलुओं पर ध्यान रख कर ही आप अपने फैसले देते थे. शायद यही कारन रहा होगा लोगो ने आपको “क़ानूनी “ की  उपाधि दी .और प्यार से लोग आपको “कानुंची लखन “ कहने लगे. आपकी न्यायप्रियता और निष्पक्षता के कारन ही सिर्फ मोकामा के लोग ही नहीं मोकामा के आस पास बसे गाऊं के लोग भी आपसे पंचायती करवाते थे,गोसाई गाऊं,घोसवरी,सम्यागढ़,चिंतामन चक,सिखारी  चक,आदि गाऊं में  आपने बहुत सारे पंचायती किये .३०-४० के दशक में जब शिक्षा को लोग समय और धन की बर्बादी मानते थे .आपने अपने समाज को शिक्षा पाने के लिए प्रेरित किया .छोटे बड़े सबको पढ़ने के लिए कहा करते थे.आपने कभी किसी स्कूल ,महा विद्यालय में कभी भी अप्ध्यापक या प्रोफ़ेसर के रूप में काम नहीं किया .मगर जब भी मौका मिलता था आप अपने ज्ञान से सबको शिक्षा देते रहे, राम रतन सिंह महा विद्यालय की रूप रेखा में आपका विषेस समर्पण ,या शुरुआती दौर में खुद वर्ग में जाकर छात्रों को पढाना ,महिलाओ और लड़कियों के लिए शिक्षा की पैरवी आप उस समय किया करते थे जिसके कारन बहुत सी महिलाओं ने शिक्षा ग्रहण की. और समाज  ने फिर आपको एक नया नाम  दिया . स्कूल बाबू जो बाद में “इस्कूल बाबू” हो गया .किसानो को भी खेती के साथ साथ पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे,खुद भी एक किसान रहे ,खेती में नित नए प्रयोग करते रहे .आपका बाग (गाछी) उस समय की सबसे सुन्दर और फलदार  था,आपके बाग में फलदार पेड़ जैसे आम, अमरूद,कटहल,निम्बू,महुआ जैसे परम्परागत पेड़ तों थे ही साथ सौफ,मूंगफली,चीकू,सरीफा आदि जैसे भी खेती होती थी.दूर दूर से लोग आपके गाछी को देखने आते थे और आप उन्हें हमेशा कोई न कोई पेड़ पौधा देते थे साथ साथ  खेती की उन्नति के उपाय बताते रहे.
आपका जन्म सकरवार टोला मोकामा में बाबू राम बखत सिंह के घर हुआ,सादा  जीवन उच्च विचार के सिद्धांत पर अपने जीवन के अंत तक कायम  रहे .18 दिसंबर  1997 को 94 साल की आयु में  आपने अपना देह त्याग किया .
सर्दियों के दिन थे .गंगा मैया बिलकुल सुखी हुई थी .आपके प्रताप को देखते हुए लोग आपको सिमरिया ,बनारस, या गया जी ले जाने की सलाह दे रहे थे,मगर आपकी इच्छा थी की आपका संस्कार  कौवा कोल(भुत नाथ ) में ही हो.सब लोग परेशान थे की गंगा में में तों ठेहुना(घुटना) भर पानी भी नहीं है.तों अंतिम संस्कार कैसे होगा.मगर आपकी अंतिम इच्छा पूरी करने हेतु लोग आपको वंहा ले गए .मगर देखते देखते वंहा गंगा भर गई.जैसे सावन भादो (बरसात) का महीना हो.मानो स्वयं गंगा आपको लेने आई हो.लोग तों पहले से ही आपके जाने के गम में बिचलित थे.मगर जब ये वाक्या हुआ तों लोगों की आख पुन्ह भर आई.इस्कूल बाबू  आपकी 15 वि पुन्य तिथि पर मोकामा ऑनलाइन की तरफ से भाव भीनी श्रधांजलि.

अमर शहीद प्रफुल्ल चंद चाकी

२ मई १९०८ की सुबह  रेलवे के उस पुलिया पर दोनों और से दना दन गोलियाँ चल रही थी.जो लोग उस समय वंहा रेलवे स्टेशन पर अपने गाड़ियो का इन्तजार कर रहे थे  उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था लोग जन्हा जगह मिली वही छुप गए.लगभग २:३० घंटा गोलियों की गूंज से गुंजायमान रहा वो रेलवे स्टेशन. वो बहादुर जाबांज २:३० घंटे  तक अपनी छोटी सी रिवाल्वर से लड़ता रहा अंग्रेजों से,अपने आप को चारों और से घिरा जानकार भी उसने न तो अपने कदम पीछे खींचे और न ही आत्मसमर्पण की .अपने बहादुरी के दम पर उन्होंने लगभग ६ अंग्रेज पुलिस वाले को घायल कर दिया.वो लड़ते रहे आखिरी दम तक पर जब उन्होंने देखा की अब आखिरी गोली बची है और अंग्रेज अभी भी  चारों और से गोलियाँ चला रहे हैं तो उस तरुण ने वंही उस मिटी को नमन किया .अपने आप को भारत माँ के चरणों मैं कुर्बान करने की कसम तो वो पहले ही ले चूका था पर उसकी आँखों  से बहते आंसू ये व्यान  कर रहे थे की वो जो अपनी धरती माँ के लिए करना चाहता था वो अधूरा रह गया,पर उसका वो संकल्प की जीते जी कभी भी किसी अंग्रेज के हाथों नहीं आएगा उसने अपनी आखिरी गोली को चूमा वंहा की धरती का आलिंगन किया और उस गोली से अपने ही सर को निशाना बना के रिवाल्वर चला  दी .अंग्रेज भी हक्के बक्के रह गए , उसके बाद जो हुआ उसकी वंहा के लोगों ने कल्पना तक नहीं की थी.जब गोलियों की आवाज़ आनी बंद हुई तो लोगों ने देखा की पुलिया के उत्तर भाग मैं २०-२१ साल का एक लड़का लहूलुहान गिरा पड़ा है और कुछ अंग्रेज पुलिस उसे चारों और से घेरे हुए है . कोई कुछ समझ पता उससे पहले ही अंग्रेजों ने उस लड़के की लाश को अपने कब्जे मैं लेकर चलते बने. आज़ादी का ये दीवाना कोई और नहीं  वो प्रफुल्ल चंद चाकी थे


१० दिसम्बर १८८८ को बिहारी ग्राम जिला बोगरा (अब बांग्लादेश ) में जन्मे प्रफुल्ला चंद्र चाकी को बचपन से ही अपनी मातृभूमि से लगाव था . बचपन से ही उग्र सवभाव था  ,देश की गुलामी उन्हें हमेशा ही खलती रहती थी . वो देश को आज़ाद करने के लिए तरह तरह के विचार दिया करते थे . जब वो मात्र २० वर्ष के थे तब ही उन्होंने अंग्रेजो से लोहा लेना शुरू कर दिया था .अपने छात्र जीवन से ही चाकी ने अंग्रेजों से बगावत शुरू कर दिया . 1905 के बंगाल विभाजन और 1907 में नया कानून बनाकर अंग्रेजों द्वारा लोगों को प्रताड़ित करते देख खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद चाकी  ने हुकूमत से बदला लेने का मन बनाया। किंग्सफोर्ड ऐसे ही जज थे, जिन्होंने कई क्रांतिकारियों को मौत की सजा सुनायी थी। यही कारण रहा कि बंगाल से मुजफ्फरपुर किंग्सफोर्ड के तबादले के बावजूद खुदीराम बोस और चाकी ने बदला लेने का विचार नहीं त्यागा। 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किंग्सफोर्ड की हत्या के लिए मुजफ्फरपुर में कंपनीबाग रोड स्थित क्लब के समीप बम फेंका। फोर्ड बच गये, चूंकि वे गाड़ी में थे ही नहीं, लेकिन इस घटना में दो महिलाओं की मौत हुई. जब प्रफुल्ला और खुदीराम को ये बात पता चली की किंग्स्फोर्ड बच गया और उसकी जगह गलती से दो महिलाएं मारी गई तो वो दोनों थोरे से निराश हुए वो दोनों ने अलग अलग भागने का विचार किया और भाग गए . मुजफ्फरपुर(बिहार) में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ यह पहला बम विस्फोट था खुदीराम बोस तो मुज्जफर पुर में पकरे गए और उन्हें इसी मामले में को 11 अगस्त 1908 को फांसी हुई पर प्रफुल्ला चाकी जब रेलगारी से भाग रहे थे तो समस्तीपुर में एक पुलिस वाले को उनपर शक हो गया वो उसने इसकी सूचना आगे दे दी जब इसका अहसाह परफुल्ला  हुआ तो वो मोकामा रेलवे स्टेशन पर उतर गए पर पुलिस ने पुरे मोकामा स्टेशन को घेर लिया था.और आज़ादी का ये वीर  सपूत अपने बलिदान से मोकामा की वो धरती को अमर बना गया ,अपने माँ –बापका एकलौता संतान होने के बाबजूद उसने देश की खातिर अपने को कुर्बान कर दिया.मगर आज़ादी के इस दीवाने का जितना तिरस्कार हो रहा है वो बर्दास्त के काबिल नहीं है वर्षों पहले  उनके नाम से एक शहीद  द्वार तो बना पर वो आज इतना जर्जर है की वो कब गिर जाये कुछ कहा नहीं जा सकता .किसी ने सच की कहा है“उनकी तुर्बत पर नहीं हैं एक भी दीया, जिनके लहू से रोशन हैं चिरागे वतन .जगमगा रही हैं कब्रे उनकी बेचा करते थे जो शहीदों के कफ़न !!
अमर शहीद प्रफुल्ल चंद चाकी
पिछले साल २०१० को इनकी जन्म दिवस पर  भारत सरकार ने उनके सम्मान मैं डाक टिकट  भी जारी  किया था .मैं भारत सरकार,बिहार और बंगाल सरकार से आग्रह करता हूँ की इस शहीद का सम्मान हो ऐसा  कुछ  जरुर किया जाये जिससे उस देशभक्त को उचित सम्मान मिल सके ,इनकी वीरगाथा को पाठ्य पुस्तकों मैं शामिल  किया जाय ,कोई फिल्म बनवाया जाय , कोई अच्छा सा शहीद  द्वार या कोई स्मारक बनवाया जाय ताकि आने वाली पीढिया उनके बलिदान को जान सके.अंत मैं उस वीर प्रफुल्ल चंद चाकी को नमन .

अमर शहीद प्रफुल्ल चंद चाकी !

२ मई १९०८ की सुबह  रेलवे के उस पुलिया पर दोनों और से दना दन गोलियाँ चल रही थी.जो लोग उस समय वंहा रेलवे स्टेशन पर अपने गाड़ियो का इन्तजार कर रहे थे  उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था लोग जन्हा जगह मिली वही छुप गए.लगभग २:३० घंटा गोलियों की गूंज से गुंजायमान रहा वो रेलवे स्टेशन. वो बहादुर जाबांज २:३० घंटे  तक अपनी छोटी सी रिवाल्वर से लड़ता रहा अंग्रेजों से,अपने आप को चारों और से घिरा जानकार भी उसने न तो अपने कदम पीछे खींचे और न ही आत्मसमर्पण की .अपने बहादुरी के दम पर उन्होंने लगभग ६ अंग्रेज पुलिस वाले को घायल कर दिया.वो लड़ते रहे आखिरी दम तक पर जब उन्होंने देखा की अब आखिरी गोली बची है और अंग्रेज अभी भी  चारों और से गोलियाँ चला रहे हैं तो उस तरुण ने वंही उस मिटी को नमन किया .अपने आप को भारत माँ के चरणों मैं कुर्बान करने की कसम तो वो पहले ही ले चूका था पर उसकी आँखों  से बहते आंसू ये व्यान  कर रहे थे की वो जो अपनी धरती माँ के लिए करना चाहता था वो अधूरा रह गया,पर उसका वो संकल्प की जीते जी कभी भी किसी अंग्रेज के हाथों नहीं आएगा उसने अपनी आखिरी गोली को चूमा वंहा की धरती का आलिंगन किया और उस गोली से अपने ही सर को निशाना बना के रिवाल्वर चला  दी .अंग्रेज भी हक्के बक्के रह गए , उसके बाद जो हुआ उसकी वंहा के लोगों ने कल्पना तक नहीं की थी.जब गोलियों की आवाज़ आनी बंद हुई तो लोगों ने देखा की पुलिया के उत्तर भाग मैं २०-२१ साल का एक लड़का लहूलुहान गिरा पड़ा है और कुछ अंग्रेज पुलिस उसे चारों और से घेरे हुए है . कोई कुछ समझ पता उससे पहले ही अंग्रेजों ने उस लड़के की लाश को अपने कब्जे मैं लेकर चलते बने. आज़ादी का ये दीवाना कोई और नहीं  वो प्रफुल्ल चंद चाकी थे

१० दिसम्बर १८८८ को बिहारी ग्राम जिला बोगरा (अब बांग्लादेश ) में जन्मे प्रफुल्ला चंद्र चाकी को बचपन से ही अपनी मातृभूमि से लगाव था . बचपन से ही उग्र सवभाव था  ,देश की गुलामी उन्हें हमेशा ही खलती रहती थी . वो देश को आज़ाद करने के लिए तरह तरह के विचार दिया करते थे . जब वो मात्र २० वर्ष के थे तब ही उन्होंने अंग्रेजो से लोहा लेना शुरू कर दिया था .अपने छात्र जीवन से ही चाकी ने अंग्रेजों से बगावत शुरू कर दिया . 1905 के बंगाल विभाजन और 1907 में नया कानून बनाकर अंग्रेजों द्वारा लोगों को प्रताड़ित करते देख खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद चाकी  ने हुकूमत से बदला लेने का मन बनाया। किंग्सफोर्ड ऐसे ही जज थे, जिन्होंने कई क्रांतिकारियों को मौत की सजा सुनायी थी। यही कारण रहा कि बंगाल से मुजफ्फरपुर किंग्सफोर्ड के तबादले के बावजूद खुदीराम बोस और चाकी ने बदला लेने का विचार नहीं त्यागा। 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किंग्सफोर्ड की हत्या के लिए मुजफ्फरपुर में कंपनीबाग रोड स्थित क्लब के समीप बम फेंका। फोर्ड बच गये, चूंकि वे गाड़ी में थे ही नहीं, लेकिन इस घटना में दो महिलाओं की मौत हुई. जब प्रफुल्ला और खुदीराम को ये बात पता चली की किंग्स्फोर्ड बच गया और उसकी जगह गलती से दो महिलाएं मारी गई तो वो दोनों थोरे से निराश हुए वो दोनों ने अलग अलग भागने का विचार किया और भाग गए . मुजफ्फरपुर(बिहार) में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ यह पहला बम विस्फोट था खुदीराम बोस तो मुज्जफर पुर में पकरे गए और उन्हें इसी मामले में को 11 अगस्त 1908 को फांसी हुई पर प्रफुल्ला चाकी जब रेलगारी से भाग रहे थे तो समस्तीपुर में एक पुलिस वाले को उनपर शक हो गया वो उसने इसकी सूचना आगे दे दी जब इसका अहसाह परफुल्ला  हुआ तो वो मोकामा रेलवे स्टेशन पर उतर गए पर पुलिस ने पुरे मोकामा स्टेशन को घेर लिया था.और आज़ादी का ये वीर  सपूत अपने बलिदान से मोकामा की वो धरती को अमर बना गया ,अपने माँ –बापका एकलौता संतान होने के बाबजूद उसने देश की खातिर अपने को कुर्बान कर दिया.

मगर आज़ादी के इस दीवाने का जितना तिरस्कार हो रहा है वो बर्दास्त के काबिल नहीं है वर्षों पहले  उनके नाम से एक शहीद  द्वार तो बना पर वो आज इतना जर्जर है की वो कब गिर जाये कुछ कहा नहीं जा सकता .

किसी ने सच की कहा है

“उनकी तुर्बत पर नहीं हैं एक भी दीया, जिनके लहू से रोशन हैं चिरागे वतन ,

जगमगा रही हैं कब्रे उनकी बेचा करते थे जो शहीदों के कफ़न !!

prafullachand chaki

अमर शहीद प्रफुल्ल चंद चाकी

पिछले साल २०१० को इनकी जन्म दिवस पर  भारत सरकार ने उनके सम्मान मैं डाक टिकट  भी जारी  किया था .मैं भारत सरकार,बिहार और बंगाल सरकार से आग्रह करता हूँ की इस शहीद का सम्मान हो ऐसा  कुछ  जरुर किया जाये जिससे उस देशभक्त को उचित सम्मान मिल सके ,इनकी वीरगाथा को पाठ्य पुस्तकों मैं शामिल  किया जाय ,कोई फिल्म बनवाया जाय , कोई अच्छा सा शहीद  द्वार या कोई स्मारक बनवाया जाय ताकि आने वाली पीढिया उनके बलिदान को जान सके

अंत मैं उस वीर प्रफुल्ल चंद चाकी को नमन ..

मगही कवि भाई बालेश्वर!

मगही कवि भाई बालेश्वर

सामंतवादी माहौल ने एक रिक्शा चालक को कवि बना दिया.जिला स्तर पर ही सही ,लेकिन उनकी एक पहचान है .बाढ़ कोर्ट में एडवोकेट लिपिक (ताईद) के रूप में कार्यरत भाई बालेश्वर की पहचान एक मगही कवि के रूप में ज्यादा है.

विद्रोही तेवर वाले भाई बालेश्वर का बाल्यकाल मोकामा में बीता. अपनी नानी माँ के घर में एकलौते होने की वजह से प्यार इतना मिला की सामंती संस्कार वाले लोगो से टकराने पर अमादा हो गए .मैट्रिक पास करते  ही पत्नी का बोझ सर पर आ गया .वे फरक्का बेरेज में काम करने चले गए .लेकिन जसे ही इन्हें पता चला की इनकी पत्नी सुता मिल में काम कर रही है .वो वापस आ कर रिक्शा चलने लगे .इसी बीच वो तत्कालीन संचार विभाग के निरीक्षण विजन जी के संपर्क में आये और रिक्शा चालक से मगही कवि बन गए .तब से इनका लिखना जारी है .

भाई बालेश्वर को 1994 में बिहार् दलित साहित्य अकादमी सम्मलेन द्वारा परश्सित पत्र दिया गया .1995 में इन्हें मगही विकास परिसद्द्वारा ‘मगध रत्न से सम्मानित’किया गया.२००१ में तत्कालीन सांसद विजय कृष्ण द्वारा और २००५ अं अनुमंदाल्धिकारी वंदना प्रियदर्शी द्वारा परश्सित पत्र दिया गया.आभाव ग्रस्त होने के वावजूद मगही कवि भाई बालेश्वर के लेखन को तब बल मिलता है जब मंच से वे कविता पाठ करते है और तालियों की गडगडाहट सुनने को मिलती है. ‘हम टाल के करिया माटी ही’,दुशासन का दालान ,गरीबी भ्रस्टाचार,भेंस के पोता,जुल्मी सीमा लाँघ देलक,हमर मोछ की तोहर मोछ ,समेत सेकडो कविता लिखने वाले मगही कवि भाई बालेश्वर को मलाल है की उन्हें जिला स्तर पर तो सम्मान तो मिला लेकिन राज्य या राष्टीय स्तर  पर नहीं इस मगही लेखक को भले ही बड़ा मंच  नहीं मिला लेकिन इनकी लेखनी का विषय हमेशा व्यापक रहा …..

भाई बालेश्वर जी आप मोकामा के करिया मिटटी के लाल है हमें आप पर नाज़ है

मगही कवि भाई बालेश्वर

सामंतवादी माहौल ने एक रिक्शा चालक को कवि बना दिया.जिला स्तर पर ही सही ,लेकिन उनकी एक पहचान है .बाढ़ कोर्ट में एडवोकेट लिपिक (ताईद) के रूप में कार्यरत भाई बालेश्वर की पहचान एक मगही कवि के रूप में ज्यादा है.विद्रोही तेवर वाले भाई बालेश्वर का बाल्यकाल मोकामा में बीता. अपनी नानी माँ के घर में एकलौते होने की वजह से प्यार इतना मिला की सामंती संस्कार वाले लोगो से टकराने पर अमादा हो गए .मैट्रिक पास करते  ही पत्नी का बोझ सर पर आ गया .वे फरक्का बेरेज में काम करने चले गए .लेकिन जसे ही इन्हें पता चला की इनकी पत्नी सुता मिल में काम कर रही है .वो वापस आ कर रिक्शा चलने लगे .इसी बीच वो तत्कालीन संचार विभाग के निरीक्षण विजन जी के संपर्क में आये और रिक्शा चालक से मगही कवि बन गए .तब से इनका लिखना जारी है .भाई बालेश्वर को 1994 में बिहार् दलित साहित्य अकादमी सम्मलेन द्वारा परश्सित पत्र दिया गया .1995 में इन्हें मगही विकास परिसद्द्वारा ‘मगध रत्न से सम्मानित’किया गया.२००१ में तत्कालीन सांसद विजय कृष्ण द्वारा और २००५ अं अनुमंदाल्धिकारी वंदना प्रियदर्शी द्वारा परश्सित पत्र दिया गया.आभाव ग्रस्त होने के वावजूद मगही कवि भाई बालेश्वर के लेखन को तब बल मिलता है जब मंच से वे कविता पाठ करते है और तालियों की गडगडाहट सुनने को मिलती है. ‘हम टाल के करिया माटी ही’,दुशासन का दालान ,गरीबी भ्रस्टाचार,भेंस के पोता,जुल्मी सीमा लाँघ देलक,हमर मोछ की तोहर मोछ ,समेत सेकडो कविता लिखने वाले मगही कवि भाई बालेश्वर को मलाल है की उन्हें जिला स्तर पर तो सम्मान तो मिला लेकिन राज्य या राष्टीय स्तर  पर नहीं इस मगही लेखक को भले ही बड़ा मंच  नहीं मिला लेकिन इनकी लेखनी का विषय हमेशा व्यापक रहा भाई बालेश्वर जी आप मोकामा के करिया मिटटी के लाल है हमें आप पर नाज़ है.