लाल मोकामा के नाज़ है जिनपर !

मोकामा समूह के सभी सदस्यों को प्यार भरा नमस्कार .आज आप सब से एक सहयोग चाहता हूँ.जैसा  की हम सब जानते है मोकामा ऑनलाइन वेबसाइट के रूप मैं लगभग २ साल का सफर तय कर  चूका है.आप सब का सहयोग और प्यार ही इसे इस मुकाम लाया है .जब हम लोगों ने इसे शुरू किया था तब हमारी गिनती सिर्फ २०-२५  थी आज जन हमारी गिनती लगभग ७५० जा चुकी है .मगर आज भी हम अपने मकसद पर एक हद तक ही कामयाब हो पायें है .आज भी मोकामा को अच्छे चीजों के लिए नहीं जाना जाता है.में इस कलंक कथा को जयादा नहीं बढ़ाऊंगा. हमारी कोशिश थी की हम उस कलंक कथा को मिटा सकें .हम लोग यदि मिल कर पर्यास करें तो इस कलंक कथा को मिटा कर एक नया इतिहास लिख सकते है. इसलिए आप सब से निवेदन है की अपने मोकामा के सुखद भविष्य के लिए अपना सहयोग दें.

हमलोगों ने मोकामा ऑनलाइन( http://mokamaonline.com/?cat=18 ) में एक लिंक दिया है(धरित्री :- Hero of the week /नाज है जिनपर/ /शख्सियत )

धरित्री के तहत हमने ३ लिकं रखे है

१.       Hero of the week:-

२.       नाज  है जिनपर

३.       शख्सियत

अब इन ३ पर हम सब मिल कर काम करें तो जल्दी ही हमें मोकामा की अच्छाइयों से दुनिया को अवगत करा सकते है इसकी शुरुआत हो चुकी है और कुछ अच्छे लोगों के बारे में लिखा जा चूका है जिसे आप मोकामा ऑनलाइन पर देख भी सकते है.

अब प्रश्न उठता है की आप सब कैसे इस प्रोग्राम में मदद कर सकते है. हर कोई अपने माता पिता ,पूर्वजों से किसी न किसी से वीर पुरुष की वीर गाथा सुनते आय है .हर किसी के महल्ले में  कोई न कोई महान लोग हुए होंगे जिन्होंने समाज के बेहतर के लिए अपना योगदान दिया होगा.तो उनके बारे में थोड़ी से जानकारी अगर संभव हो तो उनका कोई फोटो निकालें और हमें  उनकी जानकारी  दें कुछ नाम सुझए गए है जैसे पूर्व डी जे पी बिहार आनंद शंकर  .नागेश्वर बाबु(एस.के.एम् स्कूल),सेठ मालीराम खेतान(एस.के.एम् स्कूल,मालीराम गर्न्थालय),राम रतन सिंह(आर आर एस कॉलजे)राम कृष्ण बाबु (राम कृष्ण रुद्रवती है स्कूल ) कामेश्वर बाबु (सी सी एम् स्कूल प्राचार्य ) सात शहीद पटना में(8 वें झंडा फहरा कर माली का वेश बनाकर भगने वाले राम नंदन सिंह ) …मगर कोई तस्वीर नहीं होने के कारन नहीं  लगा प् रहा हूँ .कुछ लोगों के बारे में जानकर हैरान हूँ की Presidential Award for Excellence in Teaching जैसे अवार्ड मोकामा के लोगो को बहुत पहले ही मिल चूका है, जिनके नाम U.S.A से 4 से 6 पटेंट है awarded  by Vice President of  India for his EXCELLENT work  in mining industry. जैसे अवार्ड प्राप्त मोकामा के महारथी से आपका परिचय जल्द ही होगा.,

आप भी सहयोग करें आपके पास भी येसी  कोई जानकारी है तो तो हमें बताएं ताकि मोकामा  का गौरव पुन्ह बढ़ाया  जा सके. उम्मीद करता हूँ सिर्फ लाइक और सिर्फ कोमेंट ही  नहीं मिलगा बल्कि ७५० लोग मिलकर कम से कम ३०० अच्छे लोगों का विवरण दे सकेंगे. हमलोगों ने  तय किया है की  मोकामा से हर सप्ताह एक मेहनती व्यक्ति  को चुनेंगे और उसे “Hero of the week” बनायेंगे,ताकि दूसरे लोग भी उन्हें देखकर उत्साहित हों और अपने जीवन का सर्वांगीण विकाश कर सकें  अतः आपसे भी अनुरोध है की अगर आपके नज़र में भी कोई एस व्यक्ति है जो अच्छा कर रहा है तो कृपया सूचित करें और उस महा मानव का सम्मान करने में हमारी मदद करें .
साथ साथ हमलोग अपने पूर्वजों का भी सम्मान करना चाहते है ,जिन्होंने समाज को एक बेहतर आयाम देने की कोशिश की थी ,इस कड़ी में हम उन पुण्यात्माओं को भी नमन करेंगे .इसलिए आप से अनुरोध है की अगर आप भी किसी पुण्यात्मा को मोकामा ऑनलाइन पर सम्मान दिलाना चाहते है तो कृपया हमें सूचित करें.आप को जैसे  भी सुविधा हो सादे कागज पर हाथ से लिख कर ,या कंप्यूटर टाइप करके हमें भेजें Email:-mokamaonline@gmail.com

जय परशुराम जय मोकामा

स्मिता कुमारी !

स्मिता कुमारी :- आप का जन्म बिहार के पटना जिले के मोकामा में हुआ.बचपन से ही खेल के प्रति आपका रुझान  ही आपको खेल के महा कुम्भ तक ले कर गया.आपने महिला कब्बडी को एक नया आयाम दिया है. आपके नेतृत्व में भारतीय महिला कब्बडी टीम ने १० दक्षिण एशियन गेम और १६ एशियन गेम में स्वर्ण पदक हासिल किया.आप के नेतृत्व में महिला कब्बडी टीम आसमान की उचाई तक गई. आपकी चुस्ती फुर्ती की कायल आपकी विपक्षी टीम की खिलाडी भी करती है .आपकी इसी हुनर पर आपको कई नमो से जाना जाने लगा तत्कालीन मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने आपको  “कब्बडी गर्ल”, तो पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव  ने  आपको “गोल्डन गर्ल” कहा. आपने अपने लगन और मेहनत से मरांची जैसे छोटे गावं का नाम रौशन किया. हमें आप पर नाज़ है.

डॉ जनार्दन प्रसाद सिंह(जानो दा)!

jpडॉ जनार्दन प्रसाद सिंह(जानो दा):- २० अगस्त १९३५  की रात बिहार के पटना जिले की मोकामा सकरवार टोला  की पावन भूमि पर   श्री महावीर सिंह के घर में इनका जन्म हुआ था. आपका  उन्नत ललाट ,चेहरे का  तेज बचपन से ही आपको भीड़ से अलग दिखाता था . माता बनारसी देवी और पिता महावीर सिंह ने आपको बचपन से ही पढ़ने के लिए प्रेरित किया और आपने भी सन १९५३ की मेट्रिक परीक्षा में पुरे बिहार में ३ स्थान प्राप्त किया.सन १९५५ में साइंस कौलेज पटना में १ स्थान लाकर आपने अपने कुल का नाम रौशन लिया .१९६० में M.B.B.S की परीक्षा में पटना मेडिकल कौलेज में आप दूसरे स्थान पर रहे.१९७६ से १९७८ तक उच्च शिक्षा हेतु इंग्लॅण्ड गए . सन १९६१ से १९६५ तक आपने P.M.C.H के एनाटोमी विभाग में अध्यापक का प्रभार संभाला . आप बिहार के विभिन्न मेडिकल कौलेज में योगदान देते रहे ,आपने  सन १९९५ में पटना मेडिकल कौलेज के मेडिसिन विभाग से प्राध्यापक पद से आवकाश प्राप्त किया .आपकी सामजिक कार्यों में रूचि ही आपको उन सब डॉक्टर से अलग करती है .आपने डोक्टोरी भी सीधे समाजसेवा से जोड़ दिया . आप बहुत बड़े डॉक्टर थे दूर दूर से लोग आपसे दिखाने के लिए आते थे.मगर ये आप पर अगाध विश्वास था या कोई चमत्कार लोग आपके क्लिनिक में आते ही अपने को स्वास्थ महसूस करने लगते थे. जिनकी नब्ज आपने छू दी वो क्लिनिक से निकलते ही अपने आप को चंगा मान बैठता था. आप डॉक्टर से पहले  एक  सच्चे इंसान थे तभी तो आप जब दिल करे गली के किसी बच्चे से घंटों बाते करते थे.विद्यार्थी हिंदी पुस्तकालय के नव निर्माण में आपके सहयोग को समाज कभी भुला न पायेगा.हर पर्व त्यौहार को आप जिस अंदाज में मनाते  थे उसका कोई जोड़ नहीं .जीवन के अंतिम दिनों तक भी आपने मानव धर्म निभाया.लोगों के हर सुख दुःख में शामिल  होते थे आप.यही कारन था की आज भी लोग आपको जानो दा के नाम से ही जानते है .आप हमेशा कहा करते थे डॉ जे पी सिंह पटना के लिए मोकामा के लिए जानो.जब तक रहे गरीब और असहाय का निशुल्क इलाज करते रहे.प्रकृति प्रेम आपका जग जाहिर था,आप लोगों को हमेशा पेड़ पौधे बांटा करते थे.अपनी बागवानी आप खुद सँभालते थे.खेती में भी आपने तरह तरह के प्रयोग किये. लोगों को जब आप खेती के बारे में बताते थे तो लगता ही नहीं था की आप एक डॉक्टर थे येसा लगता था मानो  कोई बहुत बड़ा कृषि वेज्ञानिक अपना लेक्चर दे रहा हो.बेटी-बहु की शादी और विदाई में आपका सहयोग कईयों के घर में खुशियां भर गया .आप सचमुच में एक महामानव थे.मोकामा ऑनलाइन की तरफ से आपको भाव भीनी क्षर्धांजलि …

(सौजन्य ४ घर  सकरवार टोला  मोकामा )

 

डॉ बैद्यनाथ शर्मा (बच्चा बाबु)

आइये आज जाने मोकामा के उस लाल को जिसने अपनी लेखनी के बल पर मोकामा का नाम रौशन किया.डॉ बैद्यनाथ शर्मा का जन्म दिनांक २७ अगस्त १९३६ को मगध साम्राज्य की गौरवशाली धरती पटना जिले के मोकामा सकरवार टोला में हुआ . गंगा(नदी) से बेहद लगाव था .बुजुर्गों ने प्यार से  इनका नाम बच्चा रख दिया और बड़े होकर भी ये बच्चा बाबु के नाम से जाने जाते रहे  गुल्ली डंडा और कब्बडी इनका प्रिय खेल था. इनके पिता पंडित केशव शर्मा का बहुत बड़ा व्यक्तित्व था जिनका असर बच्चा बाबु पर सीधे पड़ा .मद्य विद्यालय में पहली बार शिक्षक बने और फिर कभी पीछे मुड कर नहीं देखा .इसके बाद राम रतन सिंह महाविद्यालय में व्याख्याता बने.हिंदी भाषा पर इनकी पकड़ जादुई थी इसलिए इन्हें मगध विश्व विद्यालय में हिंदी का विभ्गाधय्क्ष्य (HOD) बनाया गया .इन्होने भी इसकी पद की गरिमा को अपने अनुभव और ज्ञान से ऊपर उठाया .छात्र जीवन से ही जनसंघ से जुड गए थे जबकि इनके पिता कट्टर कांग्रेसी थे पर इन्होने अपने तर्क और  ज्ञान से अपने पिता का भी दिल जीत लिया .५० से भी ज्यादा विद्यार्थी को पी. एच. डी.(P.H.D) करवाया .हजारों युवाओ का मार्गदर्शन किया .मृत प्राय विद्यार्थी हिंदी पुस्तकालय को पुन्ह नया जीवन दान देने में इन्होने अहम भूमिका निभाई. विद्यार्थी हिंदी पुस्तकालय के तत्वाधान में आर आर एस कोलेज में जब मुख अतिथि के तौर पर राज्यपाल ए आर किदवई आये तो बच्चा बाबु ने स्वागत भाषण दिया जिनकी विद्वता देखकर राज्यपाल महोदय भी दंग रह गए. उन दिनों राम मंदिर निर्माण का दौर था .आडवानी जी रथ यात्रा पर निकले थे तो उन्होंने बच्चा बाबु को बुलवाया था .और जब आडवानी जी ने उनका भाषण सुना तो तो वो बड़े आप्यायित हुए की पार्टी में येसे भी विद्वान है.हिंदी भाषा में भी इनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा.”नूतन हिंदी व्याकरण और रचना “ इनकी हिंदी व्याकरण पर लिखी बहुत ही सरल पुस्तक  है जिसे पढकर कोई भी हिंदी व्याकरण आसानी से सीख  सकता है. अख़बारों और पत्रिकाओं में इनके लेख अक्सर छपते थे.इनकी यही गुणों के कारन एक बार भारत सरकार ने इन्हें विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधि करने के लिए भेजा जिन्हें इन्होने बखूबी अंजाम दिया. डॉ बैद्यनाथ शर्मा न केवल बिहार बल्कि भारत के जाने माने साहित्यकार थे. २७ दिसंबर २००९  रविवार की  सुबह उन्होंने अपनी अंतिम साँस ली .आपके गौरव को सलाम किया तत्कालीन मुख्यमंत्री बिहार नितीश कुमार ने और मोकामा रेफरल अस्पताल का नाम आपके नाम पर डॉ. बैद्यनाथ शर्मा रेफरल अस्पताल मोकामा कर दिया .  धन्य है मोकामा के लाल जिन्होंने अपनी लेखनी के बल पर अपनी मिटटी का नाम रौशन किया. बच्चा बाबु को सत् सत्  नमन(सौजन्य आशुतोष कुमार  ‘आर्य’)

डॉ बैद्यनाथ शर्मा (बच्चा बाबु)!

आइये आज जाने मोकामा के उस लाल को जिसने अपनी लेखनी के बल पर मोकामा का नाम रौशन किया.

डॉ बैद्यनाथ शर्मा का जन्म दिनांक २७ अगस्त १९३६ को मगध साम्राज्य की गौरवशाली धरती पटना जिले के मोकामा सकरवार टोला में हुआ . गंगा(नदी) से बेहद लगाव था .बुजुर्गों ने प्यार से  इनका नाम बच्चा रख दिया और बड़े होकर भी ये बच्चा बाबु के नाम से जाने जाते रहे  गुल्ली डंडा और कब्बडी इनका प्रिय खेल था. इनके पिता पंडित केशव शर्मा का बहुत बड़ा व्यक्तित्व था जिनका असर बच्चा बाबु पर सीधे पड़ा .मद्य विद्यालय में पहली बार शिक्षक बने और फिर कभी पीछे मुड कर नहीं देखा .इसके बाद राम रतन सिंह महाविद्यालय में व्याख्याता बने.हिंदी भाषा पर इनकी पकड़ जादुई थी इसलिए इन्हें मगध विश्व विद्यालय में हिंदी का विभ्गाधय्क्ष्य (HOD) बनाया गया .इन्होने भी इसकी पद की गरिमा को अपने अनुभव और ज्ञान से ऊपर उठाया .छात्र जीवन से ही जनसंघ से जुड गए थे जबकि इनके पिता कट्टर कांग्रेसी थे पर इन्होने अपने तर्क और  ज्ञान से अपने पिता का भी दिल जीत लिया .५० से भी ज्यादा विद्यार्थी को पी. एच. डी.(P.H.D) करवाया .हजारों युवाओ का मार्गदर्शन किया .मृत प्राय विद्यार्थी हिंदी पुस्तकालय को पुन्ह नया जीवन दान देने में इन्होने अहम भूमिका निभाई. विद्यार्थी हिंदी पुस्तकालय के तत्वाधान में आर आर एस कोलेज में जब मुख अतिथि के तौर पर राज्यपाल ए आर किदवई आये तो बच्चा बाबु ने स्वागत भाषण दिया जिनकी विद्वता देखकर राज्यपाल महोदय भी दंग रह गए. उन दिनों राम मंदिर निर्माण का दौर था .आडवानी जी रथ यात्रा पर निकले थे तो उन्होंने बच्चा बाबु को बुलवाया था .और जब आडवानी जी ने उनका भाषण सुना तो तो वो बड़े आप्यायित हुए की पार्टी में येसे भी विद्वान है.

हिंदी भाषा में भी इनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा.”नूतन हिंदी व्याकरण और रचना “ इनकी हिंदी व्याकरण पर लिखी बहुत ही सरल पुस्तक  है जिसे पढकर कोई भी हिंदी व्याकरण आसानी से सीख  सकता है. अख़बारों और पत्रिकाओं में इनके लेख अक्सर छपते थे.इनकी यही गुणों के कारन एक बार भारत सरकार ने इन्हें विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधि करने के लिए भेजा जिन्हें इन्होने बखूबी अंजाम दिया. डॉ बैद्यनाथ शर्मा न केवल बिहार बल्कि भारत के जाने माने साहित्यकार थे. २७ दिसंबर २००९  रविवार की  सुबह उन्होंने अपनी अंतिम साँस ली .आपके गौरव को सलाम किया तत्कालीन मुख्यमंत्री बिहार नितीश कुमार ने और मोकामा रेफरल अस्पताल का नाम आपके नाम पर डॉ. बैद्यनाथ शर्मा रेफरल अस्पताल मोकामा कर दिया .  धन्य है मोकामा के लाल जिन्होंने अपनी लेखनी के बल पर अपनी मिटटी का नाम रौशन किया. बच्चा बाबु को सत् सत्  नमन..

(सौजन्य आशुतोष कुमार  ‘आर्य’)

रमेश नीलकमल!

आइये आज जाने मोकामा के उस लाल को जिसने अपनी लेखनी के बल पर मोकामा का नाम रौशन किया.

21 नवम्बर, 1937 को जनमे, पले-बढ़े बिहार, पटना, मोकामा के ‘रामपुर डुमरा’ गाँव में। पढ़े गाँव में, बड़हिया में, कोलकाता में बी.ए. तक। फिर पटना से बी.एल. एवं प्रयाग से साहित्य-विशारद।

नौकरी की पूर्व रेलवे के लेखा विभाग में। बहाल हुए लिपिक श्रेणी-2 पद पर 07.10.1958 को और सेवानिवृत्त हुए 30.11.1995 (अप.) को ‘कारखाना लेखा अधिकारी’ पद से।

मानदोपाधियाँ मिलीं विद्यावाचस्पति, विद्यासागर तथा भारतभाषाभूषण की।

प्रकाशित पुस्तकें : 10 काव्य, 4 कहानी, 5 समीक्षा, 2 रम्य-रचना, 3 शोध-लघुशोध, 1 भोजपुरी-विविधा तथा 1 बाल-साहित्य, कुल 26 पुस्तकें प्रकाशित।

संपादन : कुल 10 पुस्तकें संपादित। ‘शब्द-कारखाना’ तथा ‘वैश्यवसुधा’ (साहित्यिक पत्रिकाएँ) का संपादन।

पुरस्कृत-सम्मानित हुए मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, प्रेमचन्द पुरस्कार, सरहपा शिखर पुरस्कार, साहित्यसेवा पुरस्कार तथा विभिन्न नौ संस्थानों द्वारा सम्मान से। तीन दर्जन से अधिक ग्रंथों/पुस्तकों में सहलेखन। इनके ‘व्यक्ति और साहित्य’ पर सात पुस्तकें प्रकाशित। 175 पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन तथा ‘शब्द-कारखाना’ एवं ‘वैश्यवसुधा’ त्रैमासिकी का संपादन।

संपर्क : अक्षर विहार, अवन्तिका मार्ग, जमालपुर-811 214 (बिहार)

इनकी सुप्रसिद्ध रचना आप मोकमा ऑनलाइन पर भी पढ़ सकते है

१.चादर तानकर सो गया

2.लौट आओ पापा

3.बुरे वक्त की कविता

रमेश नीलकमल

आइये आज जाने मोकामा के उस लाल को जिसने अपनी लेखनी के बल पर मोकामा का नाम रौशन किया.21 नवम्बर, 1937 को जनमे, पले-बढ़े बिहार, पटना, मोकामा के ‘रामपुर डुमरा’ गाँव में। पढ़े गाँव में, बड़हिया में, कोलकाता में बी.ए. तक। फिर पटना से बी.एल. एवं प्रयाग से साहित्य-विशारद।नौकरी की पूर्व रेलवे के लेखा विभाग में। बहाल हुए लिपिक श्रेणी-2 पद पर 07.10.1958 को और सेवानिवृत्त हुए 30.11.1995 (अप.) को ‘कारखाना लेखा अधिकारी’ पद से।मानदोपाधियाँ मिलीं विद्यावाचस्पति, विद्यासागर तथा भारतभाषाभूषण की।प्रकाशित पुस्तकें : 10 काव्य, 4 कहानी, 5 समीक्षा, 2 रम्य-रचना, 3 शोध-लघुशोध, 1 भोजपुरी-विविधा तथा 1 बाल-साहित्य, कुल 26 पुस्तकें प्रकाशित।संपादन : कुल 10 पुस्तकें संपादित। ‘शब्द-कारखाना’ तथा ‘वैश्यवसुधा’ (साहित्यिक पत्रिकाएँ) का संपादन।पुरस्कृत-सम्मानित हुए मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, प्रेमचन्द पुरस्कार, सरहपा शिखर पुरस्कार, साहित्यसेवा पुरस्कार तथा विभिन्न नौ संस्थानों द्वारा सम्मान से। तीन दर्जन से अधिक ग्रंथों/पुस्तकों में सहलेखन। इनके ‘व्यक्ति और साहित्य’ पर सात पुस्तकें प्रकाशित। 175 पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन तथा ‘शब्द-कारखाना’ एवं ‘वैश्यवसुधा’ त्रैमासिकी का संपादन।संपर्क :अक्षर विहार, अवन्तिका मार्ग, जमालपुर-811 214 (बिहार)इनकी सुप्रसिद्ध रचना आप मोकमा ऑनलाइन पर भी पढ़ सकते है

मालपुर ने भरी हुंकार, बनाई समानांतर सरकार!

मोकामा (एसएनबी)। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष से भी गुरेज नहीं करने वाले क्रांति केन्द्रों की सूची में मोकामा टाल इलाके के एक गांव का योगदान वाकई अविस्मरणीय है।घोसवरी प्रखंड के मालपुर गांव के लोगों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का नाद करते हुए समानांतर सरकार का गठन कर लिया था। अंगेजों के खिलाफ गठित समानांतर सरकार में एक राजा था, प्रधानमंत्री था, मंत्रिपरिषद् थी और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित एक सेना थी। उस समांनातर सरकार में प्रधानमंत्री की भूमिका में रहे अकल गोप और सैनिक मौजी गोप आज भी जीवित हैं। सैनिक मौजी गोप की काया जर्जर हो चुकी है परन्तु प्रधानमंत्री अकल गोप की कद-काठी आज भी हड्डियों का साथ मजबूती से दे रही है। अतीत को याद करते हुए अकल गोप कहतें है कि 1942 में आंदोलन भी चरम पर था और अंग्रेजों का दमन भी परवान पर था। चौकीदारी टैक्स के नाम पर अंगेजी हुकूमत एक का बीस वसूल करती थी। अकल गोप कहते हैं कि 9 अगस्त 1942 को मालपुर के लोगों ने बैठक की तथा अंगेजी शासन को मानने से इंकार करते हुए अपनी समानांतर सरकार का गठन किया था। उस समानांतर सरकार में सरयुग गोप राजा हुए, अकल गोप प्रधानमंत्री बने, झउरी गोप, हरिहर गोप, गणोश गोप को मंत्री बनाया गया था। इसके अलावा चार दर्जन सैनिक परंपरागत हथियारों से लैस होकर सेना का हिस्सा बने थे। सैनिकों में मौजी गोप, छोटन पासवान, रामस्वरूप गोप आदि शामिल थे। अकल गोप बताते हैं कि फिरंगियों द्वारा इनके खिलाफ राजद्रोह का मामला भी दर्ज किया गया था परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मामला वापस ले लिया गया था।गुमनामी के साए में रह रहे अकल गोप और मौजी गोप का चेहरा चमक उठता है उन दिनों की याद करके। जीवन के नब्बे बसंत देख चुके घोसवरी के मालपुर निवासी अकल गोप ने भारत की आजादी के साठ से अधिक बसंत देख लिए परन्तु इनका अनुभव किसी पतझड़ से रू-ब-रू होने के समान है। स्वतंत्र भारत के बारे में पूछा गया तो चिंता की लकीरें माथे की सलवटों पर भारी पड़ गई और आंखे नम हो गई। स्वतंत्रता सेनानी अकल गोप कहते हैं-आजादी मिललो लेकिन जइसन सोंचलियो हल आ जइसन गांधी बाबा-राजेन्द्र बाबू सोंचलथिन हल, ऊ नय होलो। अकल गोप कहते हैं कि आज भी किसानों को अनाज का दाम नहीं मिलता है। नया लड़का रोजगार नहीं मिलने के कारण अपराधी बनता है। देश आजाद हुए साठ साल से ज्यादा हो गया पर आज भी जनता गरीब है और सुनने वाला कोई नहीं है। अकल गोप कहते हैं कि भारत में सब खेत को पानी, मजदूर को काम और गरीब को अच्छी पढ़ाई सरकार दे दे तो सब समस्याएं दूर हो जाएंगी। अकल गोप मौजी गोप

(राष्टीय सहारा १३-८-१)